"आप तय नहीं कर सकते कि आपके साथ यौनिक हिंसा हुई है, वो तय करेंगे!"
कड़वी कॉफी के पाँचवें एपिसोड में लेखक और पत्रकार निधीश त्यागी पहलवान लड़कियों के आंदोलन की दशा और दिशा को लेकर बात कर रहे हैं मानवाधिकार कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव और खेल पत्रकार नॉरिस प्रीतम से
(कड़वी कॉफी एक हिंदी पॉडकास्ट है, जिसमें सम-सामयिक विषयों पर विद्वान लंबी बातचीत के लिए ऑनलाइन या ऑफलाइन एकत्रित होते हैं. इस बार पॉडकास्ट की मेजबानी की है वरिष्ठ पत्रकार और लेखक निधीश त्यागी ने. पॉडकास्ट में चर्चा का उद्देश्य नारेबाजी और फतवा देना नहीं, न ही किसी सुनिश्चित निष्कर्ष तक पहुँचना है, वरन बातचीत के जरिए अपने समय को समझना है. चर्चा का विषय आपको शीर्षक और उपशीर्षक से स्पष्ट हो जाएगा.)
निधीश त्यागी
नमस्कार, कड़वी कॉफी के इस विशेष अंक में आपका स्वागत है. कड़वी कॉफी लंबी बातचीत के सिलसिले हैं जिसमें हम देश और समाज से जुड़े मसलों पर बात करते हैं ताकि उनको ठीक से समझ सकें. बिना उत्तेजित हुए, बिना तापमान बढ़ाए, बिना भावुक हुए हम उनकी पड़ताल करने की कोशिश करते हैं. साथ में उन लोगों के साथ बात करने की कोशिश करते हैं, जो इन मुद्दों को करीब से देख-जान-समझ रहे हैं ताकि उनको हम भी समझ सकें और साथ में हम आपके साथ मिलकर साझा समझ बढ़ा सकें. मैं हूँ निधीश त्यागी और आज हम बात करेंगे यौन उत्पीड़न के खिलाफ़ सत्याग्रह करती पहलवान लड़कियों और उसके बारे में सरकार, समाज, राजनीति, कानून के रवैये के बारे में. दुनिया की बेहतरीन खिलाड़ी पहलवान जो आधा साल से सत्याग्रह पर बैठी हैं. इन्होंने भारत के लिए मेडल जीते हैं और उनका आरोप है कि उनके कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष ने उनमें से कई पहलवान लड़कियों के साथ और औरतों के साथ यौन उत्पीड़न किया है. इस बीच हम सब देश में पहलवान लड़कियां को कैमरे के सामने रोते हुए देख रहे हैं. कभी उन्हें पीटा जा रहा है, कभी उनके साथ धक्का-मुक्की हो रही है, कभी उनके ऊपर घटिया और अजीब तरह के आरोप लग रहे हैं, कभी उनको धरने पर नहीं बैठने दिया जा रहा, कभी उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है. इस बीच जिनके खिलाफ़ उन्होंने आरोप लगाया है, उन्हें अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है. उनके खिलाफ़ एफआईआर दर्ज है. जो आरोप लगाने वाले हैं उनमें से एक वयस्क भी नहीं है. उनकी मांग है कि जिन्होंने उनके साथ ऐसा किया है, उस पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, जो नहीं हो रही है. जिन पर यह आरोप है वह सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद हैं, कुश्ती संघ में उन्हीं के करीबियों का कब्जा है, उत्तर प्रदेश से आते हैं और उनमें ऐसा कुछ विलक्षण, कुछ खास है जिसके कारण 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा देने वाली पार्टी बेबस होकर कुछ नहीं कर पा रही है. शायद इसे ही धर्मसंकट कहते हैं कि बेटी बचा लें या वोट बचा लें. शायद अगर वह ये सब न होते तो उनके साथ अब तक कानून अपना काम कर चुका होता, अदालतें आग-बबूला हो चुकी होतीं और आहत आस्थाओं के बहाने अब तक देश खतरे में आ चुका होता. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. क्यों? इस बारे में हम बात करते हैं अपने जमाने के एथलीट और मैराथन धावक और फिर जिंदगी भर खेल की दुनिया को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार नॉरिस प्रीतम से और उनके साथ है लीगल एक्टिविस्ट नारीवादी और मानवाधिकार एक्टिविस्ट कविता श्रीवास्तव. पहला सवाल मेरा नॉरिस से यह समझने के लिए कि एक भारतीय नौजवान को ओलिंपिक या एशियाई खेलों में मेडल जीतने के लिए किस स्तर और चीजों से गुजरना पड़ता है?
नॉरिस प्रीतम
देखिए मेडल जीतना तो बहुत दूर की बात है, सबसे पहले उस मेडल के आसपास पहुंचना, पूरे साल भर जो प्रेक्टिस करनी होती है, वह बड़ी कठिन समस्या होती है. खासतौर से भारत जैसे देश में और वो भी मैं कहना चाहूँगा कि लड़कियों के लिए और उनमें भी उन लड़कियों के लिए जो उस गांव से उस जगह से आती हैं, जहाँ पर अगर लड़की छोटी से बड़ी होती है, तो उसको घूंघट पहना दिया जाता है, वो घर से बाहर नहीं निकलतीं, स्कूल से बैठा लिया जाता है. तो अगर वहाँ की लड़कियाँ आकर खेल में मेडल ले रही हैं तो उसको बयान ही नहीं किया जा सकता. यह इतनी बड़ी उपलब्धि है. कई तरह की शारीरिक प्रॉब्लम होती हैं, पीरियड वगैरह होते हैं, जो बेचारी किसी से कह भी नहीं पातीं. वो किस कोच से यह बात कहेंगी. वो कह देगा कि बहाने मार रही है, नखरे कर रही है कि पेट में दर्द बता रही है. मैं जानता हूँ वो लड़कियां उनको जब पीरियड होता है तो मुझे बुखार है, मुझे यह है मुझे वह है, ऐसे करके अपनी प्रैक्टिस मिस कर देती हैं क्योंकि उनकी सुनने वाला कोई नहीं है. और ये वो लड़कियां हैं जिनके एरिया में शायद कभी स्पोर्ट्स नाम की कोई चीज़ नहीं थी.
बबीता और गीता के पिताजी महावीर फोगाट मास्टर चंदगीराम1 के शिष्य थे और मास्टर चंदगीराम ने अपनी दोनों लड़कियों को रेसलर बनाया था. वह भी बड़ी इंटरेस्टिंग स्टोरी है कि कैसे उनको रेसलर बनाया था. एक बार उनकी बड़ी लड़की स्कूल में छह-सात क्लास में थी कि दो-तीन लड़कों ने उसे सड़क पर कहीं छेड़ दिया. वह आई और अपने पिता मास्टर चंदगीराम को बोला जो हट्टे-कट्टे साढ़े छह फीट के थे. उनको आकर बोला कि पापा लड़के ने छेड़ दिया. उनका ख्याल था कि पापा जाएंगे और उस लड़के की पिटाई कर देंगे. लेकिन पापा चंदगीराम ने दो थप्पड़ बिटिया को मारे और बोला कि मुझे शिकायत करने आई है, उस लड़के को दो थप्पड़ क्यों नहीं मारे तूने. और इस तरह से उनको उन्होंने रेसलिंग में डाला. महावीर फोगाट उनके शिष्य थे. उन्होंने भी यह प्रण लिया था कि मैं भी अपनी बेटियों को रेसलर बनाऊंगा. और देखिए गीता और बबीता दोनों बहनें जब छोटी थीं, तो उनके साथ कोई प्रेक्टिस करने वाला नहीं था. उन्हें पहली बार लड़कों के साथ ही मिट्टी के अखाड़े में रेसलिंग कराई जाती थी.2 वहाँ सब लोग हँसते थे और कहते थे कि क्या पागल हो गया, अपनी लड़कियों को क्या बनाने में लगा हुआ है तू. लेकिन उन्होंने कोई बात नहीं सुनी. मैं यह कहानी इसलिए सुना रहा था कि किस तरह, शुरू से हर कदम पर उनके सामने एक अड़चन रहती है कि आप तो लड़की हैं, आप स्पोर्ट्स नहीं करेंगी, और वह भी रेसलिंग जैसा खेल. बैडमिंटन, टेबल टेनिस हो सकता है, पर आप रेसलिंग नहीं करेंगी.
सबसे बड़ी बात रेसलर्स के कान टूट जाते हैं. उनको बोला जाता है, तेरे कान टूट गए, तुझसे कोई शादी नहीं करेगा. यह सब उनको सोचना पड़ता था लेकिन फिर भी वो आईं. सबसे पहले गीता लंदन ओलिंपिक में पार्टिसिपेट करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. उसके बाद विनेश और साक्षी आईं. साक्षी ने 2016 में मेडल जीता, जिसका मैं खुद गवाह था. मैं वहीं था, जब उसने वह मेडल जीता. हम अपने आपको मेडल विनर समझने लगे थे. मैंने सोचा कि मेरा मेडल आ गया है. इतना जबर्दस्त उसकी परफॉर्मेंस थी. तो उनके सामने हर कदम पर कोई न कोई प्रॉब्लम है. शादी की प्रॉब्लम है, कहीं कुछ और प्रॉब्लम हैं, कहीं समाज की प्रॉब्लम है. इसके बावजूद अगर वो यह सब करके मेडल लाती हैं तो मेरा ख्याल है कि यह बहुत बहुत बड़ी उपलब्धि है भारत देश के लिए.
निधीश त्यागी
दूसरा सवाल यह है कि खेलों के संघ जैसे कुश्ती संघ का अध्यक्ष कोई कैसे बनता है? मैं यह पूछना चाह रहा हूँ कि एक ओलिंपिक मेडल लाना या ओलंपिक में भाग लेना या एशियाई खेलों में मेडल जीतना और किसी कुश्ती संघ का या फलाने संघ का अध्यक्ष बनने की प्रक्रिया कैसी है? दोनों में कितना मुश्किल आसान कैसे देखते हैं आप? कोई आदमी कुश्ती संघ का अध्यक्ष कैसे बनता है?
नॉरिस प्रीतम
किसी भी संघ3 का अध्यक्ष बनने के लिए सबसे जरूरी चीज़ है कि आपको खेल आना चाहिए. आप किसी भी संघ में देखिए, कोई भी खिलाड़ी नहीं रहा है. ये सब राजनीतिक लोग हैं और क्योंकि भारत ऐसा देश है जहाँ पर सरकार उन्हें हेल्प करती है. यूएस में संघ का आदमी वॉलंटियर होता है. वह अपने आप काम करता है, अपने पैसे से बनता है और खेल के लिए उसमें भावना होती है, खेल के प्रति प्यार होता है. यहाँ तो सब पॉलिटिक्स चलाते हैं न. और छोटे-मोटे राजनीतिक लोगों को पेज वन में तो जगह मिलती नहीं है. वहाँ तो प्रधानमंत्री छाए रहते हैं. तो उनको अगर आना हो तो उनको लगता है कि कुछ स्पोर्ट्स करो. अगर मैं मेडल लाऊँगा तो आखिरी पेज पर तो कम से कम मेरा नाम छपेगा. तो खिलाड़ियों के सिर पर वह अपनी प्रसिद्धि लेता है. अगर आज ये भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष न होते तो उनको कौन जानता था और अब लोग जानने लगे हैं. हालाँकि वो बदनामी से जान रहे हैं. तो इसलिए हरेक खेल संघ में ज्यादा से ज्यादा वो लोग हैं, जो कहीं न कहीं राजनीति से जुड़े हुए हैं. जैसे क्रिकेट संघ है. लोग बोले जा रहे हैं क्रिकेट वाले क्यों सामने नहीं आ रहे हैं. क्रिकेट वाले कैसे आएँगे? अमित शाह का बेटा तो बोर्ड ऑफ कंट्रोल का प्रेसिडेंट बना हुआ है, तो उसको नाराज करके वो क्या रेसलर के साथ बैठने जाएंगे?
निधीश त्यागी
ये मनोनीत होते हैं, नामांकित होते हैं या चुनाव से वहाँ पर आते हैं?
नॉरिस प्रीतम
चुनाव होता है लेकिन चुनाव में इकाइयां भाग लेती हैं. उनका हाल और भी बदतर है. कोई मैकेनिक है, कोई कुछ है, उनको खरीद लिया जाता है. कई जगह इलेक्शन ही नहीं होते. एक मत से हो जाता है. हर एक की जेब में पैसे पहुँच गए. यहाँ तक कि किसी-किसी खेल संघ के चुनाव में 15-15, 20-20 लाख रुपए तक एक-एक मेंबर को वोट देने के लिए दिया जाता है. वह पैसा गैरकानूनी ढंग से इधर-उधर करके रिकवर कर लिया जाता है. इसलिए कोई भी संघ कहे कि मैं दूध का धुला हूँ, मैं मानने को तैयार नहीं हूँ. एक आध कोई आया होगा कभी, लेकिन ज्यादातर लोग इसी तरह आए हैं.4
निधीश त्यागी
कविता, जब एक लड़की पहलवान बनती है, तो वह एक कॉन्ट्राडिक्शन को नेविगेट कर रही है. हम सोचते हैं 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' सरकार का नारा है और हम सोचते हैं कि कैसे बड़ी होंगी, कैसे उनकी शादी हो जाए. इस नॉर्मल नैरेटिव को तोड़ते हुए एक लड़की पहलवान बनना चुनती है और उसमें कुछ हासिल करती है. इस पूरे सोशल कन्स्ट्रक्ट को आप किस तरह देखती हैं?
कविता श्रीवास्तव
मुझे लगता है कि महिला कंप्लीट स्टीरियोटाइप को तोड़कर निकल रही है और औरत की जो यात्रा है, एक खिलाड़ी की जो भूमिका है, उसमें जीना वाकई बहुत कठिन फ्रेमवर्क है. जब आप पढ़ाई कर रहे हैं, जब आप थोड़े-बहुत बड़े हुए लेकिन शादी वगैरह के बाद उत्तर भारत में तो एक औरत के लिए यह बहुत ही ज्यादा कठिन यात्रा है. क्या वह शादी करने के बाद भी खिलाड़ी बनी रहेगी, खेल पाएगी, वह सवाल हमेशा उसके साथ रहता है. उसके पहले एक खिलाड़ी बनने के लिए एक अच्छी ट्रेनिंग पाने के लिए, स्कॉलरशिप्स पाने के लिए, वह कल्चर जिसमें स्पोर्ट्स का प्रमोशन हो, उस यात्रा में अगर स्टेट सपोर्ट न हो तो कोई लड़की आगे बढ़ नहीं सकती. अगर हम देखें तो हरियाणा से इतनी प्लेयर्स कैसे निकल रही हैं. क्योंकि वहाँ रेज़िडेंशियल स्कूल और कॉलेज हैं. इनमें लड़कियों को पढ़ाई और खेल का साथ-साथ मौका मिलता है और औरतों के जीवन में एक और पात्र होता है, वो है कोच. मान लीजिए आपने तय किया कि आप खिलाड़ी होंगी तो सारा दारोमदार वास्तव में आपके कोच पर होता है. इस संदर्भ में भी रेसलर्स बार-बार कहती हैं कि हमने अपने कोच से बात की. वह बहुत इम्पॉर्टेंट एंकर है, बहुत ही खास प्लेटफॉर्म. उस कोच के साथ आपके किस तरह के रिश्ते हैं, क्या कोई पूर्वाग्रह है. कोच आपको स्वस्थ रूप से प्रोमोट करेगा या उसमें कॉम्पिटिशन कुछ और तरह का होगा. लड़कियों को और भी ज्यादा सहना पड़ता है क्योंकि वो सब कुछ छोड़कर आई हैं और कई बार पेरेंट्स के विरोध में वो व्यक्तिगत निर्णय लेती हैं. They have to excel and if they do not excel तो फिर कहीं की भी नहीं रहतीं.
एक और चीज़ है. एक कोच ने आपको अच्छी ट्रेनिंग दे दी तो फिर अब आपका क्या सेलेक्शन होगा, सेलेक्शन के बाद किस तरह का ट्रेनिंग कैंप होगा, टूर्नामेंट कहाँ होगा. आप देख सकते हैं कि खिलाड़ी का जो क्षेत्र है, it is not just one field, the field keeps changing from one place to other. जहाँ पर सेलेक्शन के लिए आपने शुरुआत की, फिर ट्रेनिंग कैंप, फिर टूर्नामेंट और आपका इंगेजमेंट ज्यादातर डाइवर्स पुरुषों से होगा. कोच के अलावा आपका फिजियोथेरपिस्ट है. अब सारी महिलाएं तो हैं नहीं, बहुत कम महिलाएं हैं. अब राजस्थान जैसे प्रदेश हरियाणा में आपको थोड़ी ज्यादा महिला कोच मिल जाएँगी, लेकिन अन्य प्रदेशों में तो ज्यादातर पुरुष कोच ही हैं. जितने फेडरेशंस हैं जैसे राजस्थान में 40 से ज्यादा फेडरेशन हैं और राष्ट्रीय स्तर पर अगर आप देखें तो करीब 50-55 फेडरेशंस हैं और सारे पूरी तरह मेल डॉमिनेटेड हैं. सो पुरुष क्षेत्र में एक औरत को खिलाड़ी बनना होता है. जब वह एक पित्रसत्तात्मक कल्चरल स्पेस में प्रवेश करती हैं, तो यह बहुत मुश्किल होता है. हो सकता है कि उनका टूर्नामेंट लड़कियों के साथ हो लेकिन एक तरीके से ये लोग आज की भी तारीख में अभी भी आउटसाइडर्स हैं. ये रेसलर लड़कियां हैं जिन्होंने एफआईआर दर्ज कराई, बहुत सारी लड़कियां हैं. पहली एफआईआर 2012 की है. वह 2011 में रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बने थे5 और 7 मई 2023 तक बने रहे. हर चार साल बाद जीतकर वापस आ जाते थे. अगर स्ट्रक्चर देखें तो हर प्रमुख पद पर उनके ही परिवार के लोग हैं और पुरुष हैं, उनके भतीजे और बेटे और उपाध्यक्ष बेटा. अब आप देख सकते हैं यह फ़ेडरेशन का स्ट्रक्चर क्या है. How come we have such structure which ends up becoming a family fiefdom. तो कोई स्पेस नहीं है. यहाँ पर ये लड़कियों का लगातार कहना कि जब हम ट्रेनिंग के लिए जा रही हैं, तो जहाँ वो रह रही हैं, उसी फ्लोर पर यह आकर रहता था. अब आप सोच सकते हैं.
अभी हम एक पात्र को देख रहे हैं, जो आरोपी है बृजभूषण शरण सिंह. इस तरह के कितने पात्र होते होंगे. वो कहती हैं कि हम हमेशा एक साथ रहती थीं. तो खेल जगत में लड़कियों की बॉन्डिंग बहुत ज्यादा अहम है. Extremely competitive but extremely bonded also. जिस तरह के स्पेस हम औरतों को आम जीवन में मिलते हैं, वो स्पोर्ट्स जगत में आज की तारीख में भी नहीं हैं और इसलिए जो यह 12 साल तक करता रहा, वह कर सका क्योंकि इन लड़कियों के पास कोई ग्रीविंग स्पेस भी नहीं थी. कहां जाएं? क्या मंच है वह? यह जानना कितना डरावना है कि किस तरीके की कहानियाँ हैं. आज तो वो कहानियाँ पब्लिक डोमेन में भी आ गई हैं. हम लोग जो एफआईआर को पढ़ रहे थे, समझ रहे थे, हम सकते में थे. अक्सर यह होता है कि जो लड़कियां इस तरह की कहानियाँ बताती हैं, वो कभी भी पूरी बात नहीं बता सकतीं. हमें बताया गया कि एक महिला की एडिटेड स्क्रिप्ट थी. वकील ने कहा कि तुमने कहानी तो यह बताई थी, अब तुम ऐसे कैसे कहती हो? मैं बोल ही नहीं पाऊंगी, जो सारी चीजें की गईं. It’s a male bastion. बिल्कुल पुरुष स्पेस है. भारत में स्पोर्ट स्पेस अभी भी फेमिनाइन नहीं है. That journey within patriarchal space is more patriarchal than any other space. क्योंकि इस गेम में आपको प्रमोट करने के लिए पैट्रंस चाहिए तो आप खुलकर बोल भी नहीं सकती हैं.
अगर आप खुलकर बोलते हैं तो विक्टिमाइज़ेशन. और यह लड़कियाँ पहले ही इसका सामना कर रही हैं. न लॉन्ग लिस्ट में, न शॉर्ट लिस्ट में और एफआईआर दर्ज करने से पहले से. जब आप अपने सेक्शुअल हैरेसर को मना कर देते हैं, कि मैं इसकी हिस्सेदार नहीं बनूँगी तो मुमकिन है कि आपकी वह पूरी मेहनत जो आपने अपने आपको गढ़ा है, वह हुनर जो स्थापित किया है, वह किनारे हो जाए क्योंकि आपने मना कर दिया. तो यह बहुत ही डरावनी यात्रा है. मुझे लगता है कि लड़कियों ने जो यह चुप्पी तोड़ी है, यह दूर तक जाएगी. अब आप सोच सकते हैं 25 साल से विशाखा गाइडलाइंस6 मौजूद है. हम ही लोग तो गए थे न. हम 1997 में भंवरी देवी के समय गए थे. हमें जजमेंट 1997 में मिला7. 25 साल विशाखा के, 10 साल पॉश लॉ8 के और फिर भी खेलों में कोई प्लेटफार्म ही नहीं. और अब जब लड़कियों ने चुप्पी तोड़ी तो उनसे बोला जा रहा है कि क्यों चुप्पी तोड़ रही हो, तुम और लड़कियों को डीमोटीवेट करोगी, उनके पेरेंटस डर जाएंगे, तो चुप्पी तुम्हें नहीं तोड़नी थी. अब आप सोच सकते हैं खेल जगत में कितना मुश्किल है. तो हमें लगता है कि ये जो culture of denial by the head office who is the sexual harasser यह कोई नई चीज़ नहीं है. यह हमेशा होता है.
निधीश त्यागी
कविता हमें विशाखा के बारे में थोड़ा और बताएं ताकि लोग समझ सकें कि पूरा मामला क्या था.
कविता श्रीवास्तव
यह बहुत दिलचस्प है. मैंने आपको 2011 के नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट कोड ऑफ कंडक्ट के बारे में बताया, तो उस समय पॉश लॉ तो आया नहीं था. वह 2013 में आया. मैं आपको बता दूँ कि विशाखा कानून इसलिए आया क्योंकि 1992 में राजस्थान में एक बहुत बहादुर महिला भंवरी देवी का बलात्कार हुआ था क्योंकि उसने बाल विवाह रोकने के लिए कुछ प्रयास किए थे. बहुत दबंग जाति के लोग थे, नौ महीने की बच्ची और नौ महीने का लड़का शादी तो हुई लेकिन उनकी नाक-मूँछ कट गई. जैसे हमारे राजस्थान में कहते हैं कि उनकी इज्जत चली गई. हमारा पूरा उत्तर भारत तो ये नाक-मूँछ के सवाल पर अटका हुआ है. अभी भी नाक-मूँछ का ही खेल चल रहा है. जब पुरुषों की नाक-मूँछ कटती है तो क्या करते हैं. दबंग थे, पहले सोशल बॉयकॉट किया. जब देखा कि यह औरत अभी भी पीछे नहीं हटी है और अपना काम कर रही है, उसका पूरा ग्रुप है. तब उन्होंने पकड़कर छह महीने बाद 1992 में भंवरी का बलात्कार किया. जब भंवरी का बलात्कार हुआ तो वह एक क्रिमिनल केस था. उसको हमने लड़ा, बहुत ही कठिन लड़ाई थी. वह क्रिमिनल केस अपनी जगह है. आज 30 साल के ऊपर हो गया है. भंवरी को न्याय नहीं मिला है. केस हाइकोर्ट में अटका हुआ है. सारे बरी हो गए. हम एक महीने बाद अक्टूबर 1992 में ही सुप्रीम कोर्ट आ गए थे केस को लेकर जिसमें formulate guidelines for prevention of sexual harassment of women at workplace की मांग शामिल थी.
निर्भया के बाद जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी भी बनी. 1997 में वह भारत के मुख्य न्यायाधीश थे. उन्होंने और जस्टिस सुजाता मनोहर ने 14 अगस्त 1997 को फैसला दिया, जिसमें एक औरत को वर्कस्पेस सेक्शुअल हैरेसमेंट फ्री वर्कप्लेस मिले, यह उसका मानव अधिकार है. इसे मानवाधिकार की श्रेणी में डाला. उन्होंने कहा कि वह रह ही नहीं सकती अगर माहौल हॉस्टाइल हो या सैक्शुअल हैरेसमेंट को प्रमोट करने वाला हो. कौन मुझे सेक्शुअल हैरासमेंट फ्री वर्कस्पेस देगा तो ये मालिक देंगे. उन्होंने दिशा-निर्देश दिए और वर्बल और नॉन वर्बल, फिजिकल, इलेक्ट्रॉनिक को डिफाइन किया. पहले ये सारी डेफिनिशन नहीं थीं. हमने उनको मैकेनिज्म का प्रपोजल दिया. तब तक इंटर्नल कंप्लेंट्स कमेटी का मैकेनिज्म था क्योंकि लड़कियां एफआईआर दर्ज कराने नहीं जाती थीं तो कंप्लेंट्स कमेटी एक औरत के नेतृत्व में बनेगी और वो उसमें एक स्वतंत्र एनजीओ के ज़रिए स्वतंत्र होंगी. उन्होंने ये गाइडलाइंस दीं, जिसमें हर फॉर्मल-इनफॉर्मल स्पेस को इस तरह की कमेटी बनानी हैं. यह 1997 में एक ऐतिहासिक फैसला था और औरतों के वर्क कल्चर को ह्यूमैन राइट्स कल्चर की श्रेणी में डाला गया. हर इन्स्टिट्यूशन को यह काम करना था, स्पोर्ट्स जगत ने नहीं किया. 2011 में कोर्ट ने साफ लिखा कि देश की हर स्पोर्ट्स बॉडी को यह करना होगा. अगर आप देखें चार बार इसका जिक्र है. ठीक से इसे बताया गया है. विशाखा गाइडलाइन्स भी कॉपी-पेस्ट करके दे दिया. फिर भी इन लोगों ने नहीं बनाया बल्कि 2011 में तो बृजभूषण ने अध्यक्षता ली. उनको रेसलिंग फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया में बना लेना था लेकिन वह तो हुआ ही नहीं. 2013 के कानून में और भी चीज़ें हैं. जब बहुत ही ब्रॉडली डिफाइन किया कि You don’t need to be paid in a space. How does a Vinesh Phogat, how does a Sangeeta Phogat come under the purview of the sexual harassment at workplace. You don't have to be at the paid workspace. उन्होंने ट्रेनिंग का लिखा है, वॉलंटियर का लिखा है. कर्मचारी कौन है? कॉन्ट्रैक्चुअल लेबर वगैरह तो हो ही सकता है लेकिन एक ट्रेनी, वॉलंटियर, प्रोबेशनर, कोई भी हो सकता है और एंप्लॉयर कौन, anybody who supervises you. पेमेंट की जरूरत ही नहीं है.
सो यह जो हमारा कानून था, उसके तहत इसमें क्या प्रॉब्लम है? नोडल एजेंसी मिनिस्ट्री ऑफ वीमेन एंड चाइल्ड थी, जिसे मॉनिटर करना था. यहाँ तक लिखा गया है कि अगर कोई इन्स्टिट्यूशन नहीं बनाती है, तो उसको 50 हजार रुपए फाइन किया जाए. वह अगली बार भी नहीं बनाती है तो फाइन दोगुना कर दिया जाए और उसका लाइसेंस कैंसिल हो सकता है. यहाँ तक ही नहीं, international sports federations have all stated that there has to be these mechanisms. मुझे लगता है कि इसका पूरी तरह से उल्लंघन हो रहा है और इसी कारण इन लड़कियों के साथ यह सब हुआ. ये सब चैंपियंस थे. खेल रत्न अवार्ड मिले हैं. It’s a dream of every girl to get a Khel Ratna Award. Vinesh also got that, and many others got that. उसके बाद उनसे कहा जा रहा है कि आप झूठ बोल रही हैं, वह तो कर ही नहीं सकता है, और एक मायनर के साथ. उसने किसी औरत को नहीं छोड़ा, चाहे ट्रेनी हो, चाहे चैंपियन हो और किसी उम्र की औरत को नहीं छोड़ा. और एक कम उम्र की लड़की, उसके साथ भी ऐसा हुआ. तो मुझे लगता है कि ये जो चीख-पुकार है, पूरा मजमा बैठा रहा है और हम-आप चर्चा कर रहे हैं. स्पोर्ट जगत में सुधार होना चाहिए, इन लड़कियों को न्याय मिलना चाहिए क्योंकि वो अपने करियर को बलिदान कर रही हैं. हालाँकि हमको और आपको failure of the government, failure of the due diligence of the government to ensure that the law is implemented पर भी बात करनी होगी.
निधीश त्यागी
नॉरिस मैं यह पूछना चाह रहा था कि इसमें बहुत सारे खेल जगत के ही खिलाड़ी या एथलीट्स हैं जिनमें बहुत सारे लोगों ने इन लड़कियों का पक्ष नहीं लिया, उनमें पीटी ऊषा भी शामिल हैं. मैंने देखा था कि आप पीटी ऊषा के बारे में कुछ लिख रहे थे और आप उनकी कहानी भी जानते हैं. तो मैं यह समझना चाह रहा था कि यह हमेशा से ऐसा रहा है या अभी हम लोग ज्यादा बात कर रहे हैं या लड़कियों की भागीदारी शायद ज्यादा है. खासतौर पर कुश्ती क्योंकि वह कॉन्टेक्ट स्पोर्ट है, उसका एक बहुत क्लिअर फिजिकल डिमेन्शन है. दूसरे स्पोर्ट्स जैसे अगर शतरंज खेल रहे हैं तो शायद वहाँ पर ऐसी कोई बात न आती हो और हो सकता है कि आती भी हो. तो मैं समझना चाह रहा था कि ये जो इतने बड़े खिलाड़ी हैं और इन्होंने खेल से ही अपनी शादी, धन, सम्मान, प्यार, शोहरत कमाई है. वो लोग इतने खामोश हैं. कुछ लोग बोल रहे हैं. इसे आप किस तरह से देखते हैं?
नॉरिस प्रीतम
इसमें एक तो यह है कि भले ही ओलंपिक मेडलिस्ट हैं, एशियन गेम्स चैंपियन हैं, मेरे लिए बहुत बड़े लोग हैं, बहुत बड़ी इनकी उपलब्धि है. आप यह समझिए कि अभी भी भारत में एक क्रिकेटर और एक रेसलर में आसमान-जमीन का अंतर है. अगर इनके बदले तेंदुलकर बैठा होता तो सारे मंत्री लाइन लगाकर वहाँ खड़े हो गए होते. सबको लगता कि यह बहुत बड़ी चीज़ है, तेंदुलकर बैठा है लेकिन चूँकि ये रेसलर्स हैं, इसलिए इन पर लोगों ने कम से कम शुरू में ज्यादा ध्यान नहीं दिया. दूसरा जो आप कह रहे हैं कि खिलाड़ियों ने साथ क्यों नहीं दिया? हर खिलाड़ी कहीं न कहीं फेडरेशन या फेडरेशन के जरिए किसी और से जुड़ा है, जो अपना नाम सामने नहीं लाना चाहता. अब क्रिकेटर्स अगर सामने आएँगे, प्लेइंग क्रिकेटर जो शायद दिल में सोच रहे हों कि उनके साथ बुरा हो रहा है लेकिन जैसे ही वो इनके सपोर्ट में आएंगे टीम से बाहर हो जाएंगे क्योंकि अमित शाह के बेटे क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष हैं. तो वो कैसे सामने आएँगे? सिर्फ नीरज चोपड़ा ने उनका साथ दिया और बृजभूषण के खिलाफ़ बोला, वह बहुत बड़ी चीज़ है. वह आर्मी में है. आर्मीमैन ज्यादा बोलते नहीं हैं. माना जाता है कि वो सरकार के खिलाफ़ नहीं बोलेंगे.
सबसे पहला आदमी नीरज चोपड़ा है जो उसके खिलाफ़ बोला और अभी वह प्लेइंग एथलीट है और रिटायर भी नहीं हुआ है. उसको खतरा सबसे ज्यादा हो सकता था कि मुझे टीम से बाहर निकाल देंगे, मेरा पेरिस ओलिंपिक धरा रह जाएगा. आपने पीटी ऊषा की बात की. यही वह पीटी ऊषा है, जब वह 16 साल की थी, लाहौर गई थी, केरल से आई थी. यहाँ दिल्ली में हम लोगों ने मिलकर उसको रेल का टिकट दिलाया था ताकि वह लाहौर जा सके क्योंकि फ़ेडरेशन ने उसका साथ नहीं दिया था. पहली बार ही अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में वह पाकिस्तान में भागी और बाद में वह स्टार बनी. उनको स्पाइक्स नहीं मिलते थे. कई तरह की प्रॉब्लम थीं, सेक्शुअल हैरेसमेंट शायद न हुआ हो उनके साथ, लेकिन बाकी हर तरह की प्रॉब्लम उन्होंने फ़ेडरेशन की तरफ से फेस की थी. अब चूँकि उनको बीजेपी के टिकट से राज्यसभा का सदस्य बना दिया गया है, आईओए का अध्यक्ष बना दिया गया है तो उन्होंने बोला कि यहाँ पर तो इनडिसिप्लिन है. और उनके जो हैंडलर्स हैं उन्होंने उन्हें कहा कि मिलने जाओ और बोल दो कि तुम्हें उनसे सहानुभूति है और तुमको मिसकोट किया गया है और वह बेचारी लड़की उसे पता ही नहीं था शायद मिसकोट किसे कहते हैं. उसने टीवी माइक पर बोला है कि यह इनडिसिप्लिन है और वहाँ जाकर बोल रही है कि मुझे मिसकोट किया गया है क्योंकि देखिए कैसे उसे कंट्रोल किया गया.
निधीश त्यागी
यह भी एक तरह का विक्टिमाइज़ेशन है कि हम उन लोगों को इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसे जो किसान के बेटे हैं, किसान की बेटी है या किसान परिवार से जो लोग आते हैं. शायद नीरज चोपड़ा इसलिए बोल रहा है. जैसे मैंने देखा है कि 1983 की क्रिकेट टीम थी उसने उसने आलोचना की पर बाद में रोजर बिन्नी उसमें से पीछे हट गए. मैं केवल गूगल कर रहा था तो पता चला कि आमिर खान ने दंगल फिल्म से 2000 करोड़ रुपए कमाए और उसके बाद वो मन की बात सुनने यहाँ आए हुए हैं और यह आमिर खान है जो फना फ़िल्म के समय 2002 के बाद इनका विरोध कर रहे थे और आज मुँह में दही जमाकर बैठे हैं.
नॉरिस प्रीतम
ऐसा नहीं है कि मैं आमिर खान को बचाना चाह रहा हूँ. अगर आमिर खान आता तो यह तुरंत हिंदू मुसलमान का झगड़ा बन जाता.
निधीश त्यागी
मेरे इंसान बनने में अब कितने सारे झमेले हो चुके हैं कि मेरा मुसलमान होना सामने आ रहा है. इस समय की सरकार जिस पार्टी की है वो खुद को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी कहती है पर ऐसा कैसे है कि कोई भी गैरतमंद व्यक्ति चाहे महिला हों या पुरुष, जो देश के नागरिक हैं और उतने ही उनके भी अधिकार हैं, पर इसमें कोई नहीं बोल रहा है. ऐसा कैसे है?
नॉरिस प्रीतम
कमेटी ने जब बृजभूषण को इन्वेस्टिगेशन के लिए बुलाया तो वह उनको ऐसे ट्रीट कर रहे थे जैसे यह बादशाह हैं. मुझे बताइए कि कभी ऐसा होता है कि आरोपी को और जिसने कंप्लेंट दी है, दोनों को साथ बैठाकर इन्क्वाइरी हो रही है. जो लड़की बोल रही है, उसको साफ मालूम है, उसने जल्दी से बाहर से आदमी बुलाया कि ये पेपर है क्योंकि तैयारी कर रखी थी. ये सारी गलतियाँ हैं, जिसमें मुझे लगता है कि सरकार का या फ़ेडरेशन का, इन सबका हाथ था. आप मुझे बताइए कि अगर आपको कोई तकलीफ है, आप पुलिस में जाते हैं, आप रिपोर्ट लिखवाते हैं, आप एफआईआर करवाते हैं. क्या आप और मैं एफआईआर करवाने सुप्रीम कोर्ट जाएंगे? क्या यह सुप्रीम कोर्ट का काम है? पुलिस का कहना है कि आप एफआईआर करो. पुलिस ने अपने आप ही क्यों नहीं की एफआईआर? उसके दो महीने के बाद एफआईआर हो रही है. अब उसमें आरोप हो रहे हैं लेकिन चार्जशीट नहीं हो रही है. उससे पूछ भी नहीं रहा कि तूने क्या किया, क्या नहीं किया. तो जब इतना बड़ा आपका रोब है या जितना बड़ा दबदबा है तो उसमें बेचारे प्लेयर कैसे बोलेंगे? उसको फौरन अपनी टीम से बाहर होना पड़ेगा. मेरे ख्याल से इसलिए प्लेयर आगे नहीं आ रहे हैं. मैं इधर कई लोगों से, खिलाड़ियों से बात कर रहा हूँ, उन सबको बुरा लग रहा है कि जो हुआ है और जो हो रहा है, लेकिन वो सामने फेस टु फेस नहीं आ सकते. वह धरने पर नहीं बैठेंगे. पीछे कुछ थोड़ा-बहुत बोल देंगे. अब कुछ क्रिकेटर्स सामने आए हैं, 1983 की विश्व कप जीतने वाली टीम थी जिसमें कपिल वगैरह थे, वो सामने थोड़ा आए हैं. उसमें भी कुछ लोगों का नाम नहीं लूँगा, जिन्होंने बोला कि कपिल इसलिए आया है क्योंकि वह हरियाणा का है. अब अगर इस तरह की दकियानूसी बातें हो गईं तो खिलाड़ी क्यों आएगा सामने?
निधीश त्यागी
आपसे एक बात भी समझनी थी कि यह जो पिछले 20-25 सालों में हरियाणा में स्पोर्ट्स का रिनेसां हुआ, पहली बार लगा कि उनके मेडल्स पंजाब से ज्यादा बढ़ गए तो ये लड़कियां शायद उसकी पहली या दूसरी फसल की तरह दिखाई पड़ती हैं. तो यह भी एक तरह का एक नया भारत है. खासतौर पर हरियाणा से जहाँ पर खाप पंचायत भी है, बहुत सारे दूसरे रूढ़िवादी मुददे हावी रहते हैं, पर साथ में हम देख रहे हैं कि वो स्पोर्ट्स का एक नया नैरेटिव बना रहे हैं. न सिर्फ नैरेटिव बना रहे हैं बल्कि देश में शायद सबसे ज्यादा मेडल लेने वाला राज्य है जो छोटा सा है और पंजाब से ज्यादा मेडल्स वो ले आते हैं. यह बहुत बड़ी बात है. एक तरफ हम देख रहे हैं कि बृजभूषण सिंह जैसे लोग हैं, दकियानूसी है, सड़ी और सीली हुई व्यवस्था है. इस सबके बीच यहाँ तक पहुँच पाना अपने आपमें उस उपलब्धि को और ज्यादा बड़ा बनाता है. वह सिर्फ यह नहीं है कि एक रास्ता था, वहाँ आए, बीच में फँसे और किसी ने उत्पीड़न कर दिया. व्यवस्थाएं, राजनीति या संघों का हिसाब-किताब वैसा ही रहा, पर सबके बीच में ये लड़कियां यहाँ तक आ पाईं तो वह अपने आप में कितनी बड़ी उपलब्धि है. तो इस बारे में बताएं कि हरियाणा में ऐसा क्या हुआ कि जो लोग इन लड़कियों को यहाँ तक लेकर आए?
नॉरिस प्रीतम
हरियाणा जाने से पहले मैं पंजाब पर बोलना चाहूँगा. पंजाब एक जमाने में बहुत अच्छा था. सारे एथलीट वहीं से आते थे. कॉलेज बड़े अच्छे थे जहाँ से प्रवीण कुमार, गुरबचन सिंह रंधावा जैसे बड़े-बड़े नाम वहाँ से आते थे. पंजाब में दो बड़ी प्रॉब्लम सामने आई हैं. एक तो है ड्रग एडिक्शन. पंजाब के जितने यंग लोग थे वो स्पोर्ट्स के बजाय ड्रग्स में घुस गए, अफीम खाने चले गए और जो थोड़े पढ़े-लिखे थे, वो कनाडा चले गए. तो कनाडा में पंजाबी ज्यादा हैं बजाय पंजाब के. तो वहाँ से उनका यूथ माइग्रेट कर गया है. पंजाब में खेल की पहले जैसी भावना कि हम खिलाड़ी बनेंगे, अब बहुत कम हो गई है. हरियाणा के लिए यह नई चीज़ थी कि हमें कुछ अच्छा करना है और वहाँ पर कुछ स्कूल जैसे कविता बता रही थीं, स्पोर्ट्स हॉस्टल वगैरह थे, उनसे काफी मदद मिली. हालाँकि फैसिलिटीज बहुत अच्छी नहीं थीं. लेकिन खेल का एक माहौल बना रहा और जब माहौल बनता है, लाखों लोग खेलेंगे, उनमें से सैकड़ों नेशनल लेवल पर आएँगे. सैकड़ों में से कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आएँगे और आठ-दस ओलिम्पिक लेवल पर आएँगे. तो यह उसी प्रक्रिया का एक नतीजा है जिसकी वजह से हरियाणा ने अच्छा किया. उन्होंने शुरू में अवॉर्ड देने शुरू किए, मेडल विनर्स को पांच लाख-दस लाख दे रहे हैं. कुछ को नहीं मिले होंगे, वह अलग बात है लेकिन दिए गए थे. दूसरा यह कि वहाँ डाइट वगैरह ठीक है. उससे मुझे लगता है कि वहाँ स्पोर्ट्स पर ध्यान ज्यादा रहा बनिस्बत पंजाब के.
निधीश त्यागी
कविता, कितनी गजब की बात है कि आमिर खान रंग दे बसंती में यह वहाँ इंडिया गेट पर बैठा हुआ था और उसके बाद फना के समय मोदीजी के खिलाफ़ था 2002 में. उसके बाद सत्यमेव जयते आ गया तो फिर वह आम आदमी पार्टी के साथ चला गया. यह किस तरह का ब्रांड प्रमोशन है.
कविता श्रीवास्तव
देखिए, जो लार्जर पॉलिटिकल कल्चर है इसमें कोई मिडल ग्राउंड नहीं है. या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ. यहाँ कोई एंटीनेशनल वाला टेररिस्ट का या ऐंटी नेशनल नहीं है. यहाँ सीधा-सीधा एक सेक्शुअल वायलेंस केस है और देशभर में करीब एक लाख से ज्यादा सेक्शुअल वॉयलेंस के केस दर्ज हैं. तो यह एक सामान्य मामला होना चाहिए. कौन सा हेड ऑफ ऑफिस को चैलेंज नहीं किया गया है कि उस व्यक्ति ने कोई अनवेलकम एडवांस नहीं बनाया. बहुत लंबे समय से ये बातें हो रही हैं. इसको समझने के लिए आपको देखना होगा कि सबसे पहले क्या बात आती है. 18 जनवरी को बात सामने आती है और 23 जनवरी 2023 में निकल जाती हैं. ये जो पांच दिन जंतरमंतर पर जो धरना देती हैं, उसी दौरान एक मजबूत आवाज चैंपियन योगेश्वर दत्त जो दूसरा मेडलिस्ट है, वह सीधे पहली बार कहता है कि ये औरतें झूठ बोल रही हैं.9 उसके बाद दो कमेटी बनती हैं. यह हास्यास्पद है कि अभी तक तो कोई कमेटी नहीं है. फिर अचानक आप दो कमेटी बना देते हैं. दोनों कमेटी में आप मैरी कॉम को ही अध्यक्ष बना देते हैं. दोनों कमेटी में आप योगेश्वर दत्त को डाल देते हैं.10 What is the Indian Olympics Association committee? इसकी ओवरसाइट कमेटी में एडवाइजर स्पोर्ट्स मिनिस्टर अनुराग ठाकुर. ये लड़कियां दोनों कमेटी के खिलाफ आवाज उठाती हैं. एक सर्कल है जो बार-बार कह रहा है कि ये लड़कियां गलत कर रही हैं तो कहीं न कहीं बृजभूषण शरण सिंह की यूनिटी देखी गई.
शुरू से ही दिख गया कि कहीं न कहीं यह एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है. यह तो जनवरी में ही समझ में आ गया था लेकिन यह और साफ हुआ जब 8 अप्रैल को मैरी कॉम की ओवरसाइट कमेटी ने मिनिस्ट्री को रिपोर्ट सौंपी पर उसे पब्लिक नहीं किया जाता. बस यह मालूम पड़ता है उस कमेटी ने किसी एक व्यक्ति पर इशारा करने वाले उस सवाल से ही कन्नी काट ली है. पीटी ऊषा वाली दूसरी इंडियन ओलिंपिक असोसिएशन कमेटी का तो कुछ मालूम ही नहीं पड़ता. तो अब जब ये लड़कियां धरने पर आकर बैठती हैं, तब एफआईआर न दर्ज करना, इससे साफ संदेश जाता है कि कोई बहुत ताकतवर है और सब जानते हैं कि दिल्ली पुलिस को कौन चलाता है. यह गृह मंत्रालय और अमित शाह चलाते हैं. एक एफआईआर अगर दर्ज नहीं होती तो सबको लगता है कि कहीं से यह पॉलिटिकल मैसेज है. आपको एफआईआर दर्ज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़े, सोचिए. कितने खिलाड़ी कपिल सिब्बल को अपना वकील बना सकते हैं जो जाकर बहस करें. और उसमें भी दिल्ली पुलिस क्या पतली गली निकालती है. 21 अप्रैल को इन्होंने अपनी एप्लिकेशन दी थी और 28 अप्रैल को कोर्ट में दिल्ली पुलिस कहती है कि नहीं, हम तो आज एफआईआर दर्ज कर ही रहे हैं. सात दिन हमने प्रिलिमिनरी इन्क्वायरी में निकाले क्योंकि ये ललिता वर्सेस स्टेट ऑफ यूपी वाले सुप्रीम कोर्ट जजमेंट में प्रिलिमिनरी इन्क्वायरी कहा गया है. एफआईआर बेहद गंभीर हैं. मैंने उन्हें पढ़ा है. इन सभी लड़कियों के स्टेटमेंट्स भी हो जाते हैं. 164 के स्टेटमेंट के बाद क्या बचा है? पॉक्सो में कम से कम It is mandated that after the testimony of the girl you have to arrest.11 उसके बाद अरेस्ट के बजाय आप देखते हैं कि आरोपी इतने लंबे-चौड़े दावे करके बार-बार खुद को डिफेंड कर रहा है और यहाँ तक कह रहा है कि अगर कुछ भी मेरे खिलाफ निकलता है तो मैं अपने आपको लटका दूंगा. इसका मतलब वह कॉन्फिडेंट है कि उसके खिलाफ़ कुछ भी नहीं निकलेगा. तभी तो हम इस कॉन्फिडेंस से बोल सकते हैं. जब उन लड़कियों का इतना कन्टेंशस हो गया. चार एफआईआर दर्ज करने के बाद स्टेटमेंट्स होने से पहले 4 मई को क्या होता है?12 आप के एमएलए सोमनाथ भारती उस दिन तेज बारिश के कारण चारपाइयाँ लाते हैं ताकि वो सो पाएं. धरनास्थल पर बारिश हो रही है, जो प्लेयर्स धरने पर बैठी हैं उनके साथ कितनी बदसलूकी होती है, वो घायल होती हैं. जब पूरे देश ने वह देखा तो किनको गुस्सा आया? संयुक्त किसान मोर्चा और खाप. खाप जो आज तक हमेशा एंटी वीमेन रही हैं, एंटी च्वाइस रही हैं, वो तो लटका देती हैं लड़का-लड़की को.
7 मई को मैं वहाँ थी जब खिलाड़ियों की पंचायत हुई जिसमें एसकेएम और खापें भी आई थीं. हम महिला संगठन के लोग भी वहाँ थे. वो लोग कह रहे हैं कि इस बृजभूषण शरण सिंह को क्यों बचाया जा रहा है? इसके खिलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? सब लोग यही सवाल पूछ रहे हैं. फिर आप देखते हैं कि पूरे मई में यह मसला बढ़ता ही गया और उसकी इंप्यूनिटी ज्यादा ताकतवर होती रही. वह पहले ऐलान करता है कि मैं पॉक्सो के विरुद्ध जंतरमंतर पर रैली निकालूँगा, फिर वह साधु-संतों के साथ वाराणसी में करूँगा. वह अलग बात है कि उसे प्रशासन ने कैंसिल कर दिया. इस पूरे कन्टेंशस माहौल की क्लाइमैक्स हमने 28 मई को देखी जब खिलाड़ियों को दिल्ली पुलिस द्वारा जिस ढंग से घसीटा जाता है. कोई सम्मान नहीं. आप बताइए इसमें जो भी आएगा वो उसके खिलाफ़ हैं क्योंकि अगर आप न्याय की बात करेंगे तो उनकी तरफ़ माने जाएंगे? हम लोग जो पूरे जीवन हमने एंटी रेप मूवमेंट एंटी सेक्शुअल वायलेंस मूवमेंट में निकाल दिया है. आज हम जस्टिस की मांग कर रहे हैं तो हमको ये बोलेंगे कि हम उनके साथ हैं. यह क्या है. हम उनके साथ नहीं हैं, हम न्याय के साथ हैं. कौन तय करेगा कि वो सही बोल रही हैं, गलत बोल रही हैं. कोर्ट ऑफ लॉ. उस स्तर तक ले जाएं. आप कानून को क्यों कॉंप्रमाइज़ कर रहे हैं? तो whether it is an Amir Khan or it is anybody else. There are many others who could have spoken out. A lot of political parties have spoken out and people have spoken out. मुंबई में फिल्म स्टार्स के बच्चों के साथ क्या होगा? Didn’t we see what happened with Aryan Khan? Didn’t we see what other people face consequences? So, people are now calculating. When the middle class and upper middle class starts calculating. It always calculates its interests first but some people despite calculation of interest stand with justice. When those very people have always stood with justice have withdrawn clearly shows that the culture of intimidation, terror and fear is so much. This is not a democracy. In democracy would hear any voice. We would hear voice very different from us.
निधीश त्यागी
कविता, आपने कहा कि आपने एफआईआर पढ़ी हैं और उनमें बहुत सारी बातें हैं. तो कौन सी ऐसी बातें हैं, जो आपको लगता है कि बहुत डिस्टर्बिंग हैं, जिन पर हम बात कर सकते हैं?
कविता श्रीवास्तव
हाँ, बिल्कुल. मुझे लगता है कि हमें बात करनी चाहिए. मुझे लगता है एक तो जो यह लड़कियों का ट्रेनिंग स्पेस, चैंपियन टूर्नामेंट स्पेस है, it was full of a sexual violence culture. यानी वो इस बीच में चैंपियनशिप के लिए जा रही हैं. मतलब इनको तो डबल ओलिंपिक मेडल, डबल एशियन चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ देना चाहिए. जब वो बताती हैं कि उनके साथ क्या हुआ? इसमें साफ कानून है. चाहे आप आइपीसी की 354एबीसीडी उठाएं या आप प्रिवेंशन ऑफ सेक्शुअल हैरेसमेंट इन वर्कप्लेस लॉ 2013 उठाएं या पॉक्सो एक्ट उठाएं. पहले तो हम उस यंग लड़की का देख लें. वहाँ पर एक इंस्टिट्यूशनल स्पेस और इंस्टिट्यूशनल हेड, वह जिस पर उसे प्रोटेक्ट करने की ज़िम्मेदारी है, जिसकी गार्डियनशिप में है, वो ही सेक्शुअल हैरेसर है. बेटी की बात उसके पिता रख रहे हैं क्योंकि वो लड़की तो आई नहीं है. उस लड़की की जुबान से तो हम किसी ने सुनी नहीं है. उन्होंने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में रोकर वो बातें कही हैं कि कैसे बच्चियों को सभी चीजों को लेकर लालच देते हैं. आप उनको खास किस्म के खाने को मना कर रहे हैं. जो उनको मनाही है उससे आप लालच देते हैं. आप उनको कहते हैं we will select you. अब एक बच्चे का मन इतना वल्नरेबल होता है. You are tempting somebody that let me touch you. Not let me, I will touch you. When I want, you have to, I will subject you to that, you have to accept.
निधीश त्यागी
हिंदी में बोलिए क्योंकि मुझे लगता है कि ज्यादातर हमारे पाठक श्रोता हिंदी में हैं.
कविता श्रीवास्तव
जी हाँ. मुझे लगता है कि जो लड़कियों ने महसूस किया और उनके साथ जो बीती है उसमें यह था कि तुम्हें अगर खेल में रहना है, तो तुम्हें सहना होगा. हम आपके शरीर के साथ कुछ भी करें, आपको किसी को बताना भी नहीं है और आपको हम यह प्रॉमिस करते हैं कि तुम आगे बढ़ोगे. हम आपको यह खाने-पीने की भी चीज़ दे रहे हैं और भी लुभा रहे हैं चीजों के साथ. एक बच्ची जो रेसिस्ट कर रही है जिसको समझ नहीं आ रहा है वह क्या करे. जिस टूर्नामेंट में उसके साथ होता है, वह उसमें घर से मीलों दूर है, वह किसको बताए और ये लड़कियां बार-बार अपनी एफआईआर में कहती हैं कि हम लोग सब एक साथ चिपके रहती थीं कि ऐसा न हो कि हमें किसी को अकेले देख ले, क्या पता वह हमें अपने कमरे के अंदर घसीटकर ले जाए, क्या पता हमारे साथ और क्या कर ले. वो अवॉयड करते थे कि उस टाइम खाना न खाएं जब वह खाना खाने जा रहा है क्योंकि वह अकेले अपनी टेबल पर बुला लेता और वहाँ टेबल पर बैठकर शुरू हो जाता था किसी न किसी लड़की के साथ. सारे लोग बैठे हुए हैं. एक भी लड़की ऐसी नहीं जिसे नहीं कहा कि मेरी टी-शर्ट के अंदर हाथ नहीं डाला, मेरे ब्रेस्ट को दबाया नहीं है, मेरे पेट तक अपना हाथ नहीं ले गया है. अब आप सोचिए. मुझे सिहरन हो जाती है जब मैंने पहली बार पढ़ा, मैं पढ़ नहीं पाई, मैंने रख दिया. वो खेल रही थीं, चैंपियनशिप की तैयारी कर रही थीं इस कल्चर, इस माहौल में. उनका मनोबल कहीं न कहीं टूट भी रहा था.
अब आप देख सकते हैं कि ये एडवर्सिटी एक पुरुष से कितनी ज्यादा एक महिला खिलाड़ी को फेस करनी पड़ती है और वह एक अलग बात है कि अगर आप वुमन रेसलर हैं तो क्या माहौल होता होगा, किस तरह सीटी बजाई जाती होगी. वह तो छोड़ दीजिए वो सारी चीजें, कैट कॉल्स, आपकी बॉडी को लेकर जो बोला जाता है, वह सब आप एक बार छोड़ दीजिए. वह तो फेस करना ही पड़ता है लेकिन जिस माहौल में आपको हुनर को उभारना था, उसको प्रमोट करना था, वहाँ पर इतना जबर्दस्त सेक्शुअल हैरेसमेंट. एक महिला कहती है कि उस जमाने में उसके पास मोबाइल नहीं था, तो आरोपी ने कहा तो तुम घर पर बात नहीं करना चाहती हो, तो उसने कहा कि बात करा दीजिए. बात कराने के बहाने उनको नंबर मिल गया. वह घर जाती है. रोज़ बात करने के लिए उसे फोन करना. अब आप सोचिए उस लड़की का. जो इतनी मुश्किल से घर से खेलने निकली है. उसकी माँ पूछने लगी कि यह हो क्या रहा है तो उसे अपनी माँ को बताया. सारी बातें बताईं तो उन्होंने फ़ोन रिसीव करना बंद कर दिया, जिसका खमियाजा उसको आकर भुगतना पड़ा. एक प्रेज़िडेंट ऑफ फ़ेडरेशन को कोई सिग्नेचर नहीं करने होते हैं इन लोगों की सेलेक्शन वगैरह में. वह सेक्रेटरी करता है. आरोपी कहता है कि नहीं मेरे पास आना होगा और ये भागकर जाते थे अपने कोचों के पास. सारे कोचों को पता है कि क्या हो रहा है. मैंने कहा था न कि पहला रिश्ता कोच के साथ होता है. कोच कहते हैं कि यहाँ हम तुमको मदद नहीं कर सकते. तुम्हें तो जाना होगा उस कमरे में और उनके साथ वहाँ पर भी बदसलूकी होती है. पब्लिक में भी नहीं छोड़ा. एक बोलती है कि वह मेरे साथ सेल्फी लेने आ गया. ग्रुप फोटो हो रही है, वह मेरे बगल में आ गया. कहता है नहीं, हम तो सेल्फी लेंगे. वह भागती है वहाँ से. और फिर उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. सारी कहानियाँ इतनी डिस्टर्बिंग हैं और हमने सुना है कि ये बातें विनेश फोगाट ने प्राइम मिनिस्टर को खुद बताईं. उसने हमें बताया है कि उसने प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया को बताया. एक तरीके से अगर आप कानून देखें, खैर यह तो पॉक्सो नहीं है लेकिन पॉक्सो कानून में अगर किसी को बताते हैं तो उनको जरूर आगे बताना पड़ता है. वरना यह बड़ा अपराध माना जाता है. चूँकि प्राइम मिनिस्टर ने उनको बहुत अच्छे से रिसीव किया. हो सकता है उस मोमेंट पर उन्होंने वह बात रखी हो कि खेल का जो हमारा फ़ेडरेशन है, उसको ठीक कीजिए, सफाई कीजिए तो यह बात उनको आगे तक इम्प्लिमेंट करनी थी. प्राइम मिनिस्टर से ऊपर कौन है भाई. अगर हमने अपनी गुहार को उनके सामने रख दिया तो सुन लेते और कुछ करते तो आज यह नौबत न आती.
इन लड़कियों के साथ मैंने बहुत वक्त बिताया है. ये यह तक नहीं जानतीं कि प्रेस कॉन्फ्रेन्स कैसे करनी है. ये जानती नहीं हैं कि how to build a movement. ये अपना खेल जानती हैं, अपना चैंपियनशिप जानती हैं और घर जानती हैं. इसलिए इनके पति लोग जो चैंपियंस हैं, वो आकर बैठे. You can see. Look at the support they have got from their husbands. उनके पति लोग उनके साथ बैठे और बाद में पूरे गांव के बुजुर्ग सारे आ रहे हैं, साक्षी मलिक की माँ बैठी हुई है और उस दिन साक्षी मलिक की माँ को भी घसीटा. तो आप देख सकते हैं कि यहाँ पर ये लड़कियां बार-बार कहती हैं कि हमें पता नहीं है, आप हमें बता दीजिए. जब हम उनसे बात करते हैं, हमें कुछ भी नहीं पता, आप हमें राय दीजिए. फिर वो जरूर अपना मन बनाती हैं और कोई भी उन पर नहीं थोपता है. They are not seasoned movement people. उन्होंने इतना स्ट्रगल किया है अपनी चैंपियनशिप के लिए लेकिन उनसे बड़ा कोई संघर्षशील महिला नहीं है. हमारे लिए तो वो इतनी बहादुर महिलाएं हैं जिन्होंने सीधा टक्कर ली इस तरह के एक एमपी से जिसको बीजेपी में ऊपर से इतना सपोर्ट है. क्या प्राइम मिनिस्टर को अपनी पार्टी के एक मेंबर ऑफ पार्लियामेंट, छह बार सांसद का ऐसा सुलूक नहीं दिख रहा है. क्या वह पुलिस के दायरे में नहीं आएगा? क्या वह पुलिस के परे है? क्या वह कानून के परे है? It is shocking, it’s really shameful for India. जो केवल एक पार्टी का मेंबर ऑफ पार्लियामेंट है. आपके पास इतना प्रोटेक्शन है क्योंकि हो सकता है आपका जाति का प्रभाव हो और आप एक से ज्यादा लोकसभा सीटों पर प्रभाव डाल रहे हों, इसलिए आपको बचाया जा रहा है. यह बचाव क्या है? क्या दिल्ली पुलिस सीआरपीसी से नहीं चलेगी? क्या कानून का राज नहीं है? सीआरपीसी के तहत उनको अरेस्ट करना चाहिए. They have the powers, if not arrest at least proceed with chargesheet or something. यह बहुत ही शॉकिंग है. आप देखिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन जैसे आईओसी, यूनाइटेड फ़ेडरेशन और दूसरी कई इंटरनेशनल बॉडीज़ इस पर बोल रही हैं. तो मुझे लगता है कि बृजभूषण शरण सिंह कोई भगवान तो है नहीं कि इनको बचाया जा रहा है. वोट भगवान है. जो जातिगत वोट जुटा ले वह भगवान है कुछ लोगों के लिए, कुछ पार्टियों के लिए. इसलिए यह सारा खेल खेला जा रहा है लेकिन हमको बहनों के साथ खड़ा रहना है और We have to win this battle; it has become more important.
निधीश त्यागी
नॉरिस मैं यह पूछना चाह रहा था कि ये लड़कियां अपने मेडल्स गंगा में बहाने की बात कर रही थीं, तो मुझे याद आया कि मोहम्मद अली ने भी अपने मेडल्स नदी में फेंक दिए थे. वह रंगभेद के खिलाफ़ एक बड़ा स्टेटमेंट था और वह अपने आप में बड़ा गेमचेंजर भी था. हम बोलते हैं कि वह ग्रेटेस्ट शायद इसलिए भी था कि उसने यह काम किया था. तो ये मेडल फेंकने तक कोई सोचता या पहुंचता है तो वह किसी खिलाड़ी की क्या मनोदशा होती है. उसने इतनी मेहनत से उसे कमाया. हालाँकि उसमें भी सरकार के लोग और समर्थक हैं वो कह रहे हैं कि मेडल तो सरकार के हैं. यह जो तुमने जीता है, तुम्हारा नहीं है, यह तो सरकार ने जीता है तुम्हारे लिए और सरकार के कारण तुम जीती हो. तो दुनियाभर की बातें चल रही हैं. तो मेरे ख्याल से यह अपने आप में एक खिलाड़ी का जो कुछ है उसे खुद सब कुछ छोड़ देने की एक तरह की अजीब सी अवस्था है. बहुत डिस्टर्बिंग है यह. इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
नॉरिस प्रीतम
देखिए, जहाँ तक खिलाड़ियों के मेडल गंगा में फेंकने का फैसला था, मुझे नहीं पता कि कौन क्या कह रहा है? क्यों कह रहा है? मैं भी किसी हद तक उसके खिलाफ़ था. इसलिए नहीं कि वो मेडल पैसों से आया और वो पैसे सरकार ने दिए. उन्होंने खून-पसीना एक करके मेडल जीता है और वो ऐसी स्टेज पर आ गए थे, फ्रस्ट्रेशन से भी ऊपर निकल गए थे. शुक्र करो कि उन्होंने बोला, मेडल फेंक रहे हैं कहीं वो जाकर अपने आप डूब जाते? इस हालत में आ गए थे वो लोग, फ्रस्ट्रेशन की बिल्कुल लिमिट आ गई थी. जब वो जा रहे थे तो मैंने रास्ते में साक्षी की माँ को फ़ोन किया. मैंने उनको बोला कि साक्षी से मेरी बात करा दीजिए, मैं उसको कहना चाहूँगा कि ये मेडल फेंको मत. मैं दूसरा तरीका बताऊँगा तुम्हें. उन्होंने साक्षी की मम्मी को नहीं, साक्षी को नहीं, साक्षी के हस्बैंड को फ़ोन दिया. उसने कहा अंकल बोलिए, क्या कह रहे हैं? मैंने कहा देखो बेटा मेडल मत फेंको क्योंकि क्या होगा जो तुम्हारा जो शासन है, जो तुम्हारी फेडरेशन है, जो पुलिस है वो तुम्हारी बात ही सुनने को तैयार नहीं है, तुमने मेडल फेंक दिए तो मामला खत्म हो जाएगा. न तुम मेडल के रहोगे, न कुछ तुम्हें मिलेगा. मैंने बहुत समझाया उसको, वह कहता है कि हम सब निकल पड़े हैं, अब हम क्या करें? मैंने कहा अब निकल पड़े हो तो जाइए वहाँ थोड़ी सी पूजा करिए, उसके बाद इन मेडल को आप इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी के म्यूज़ियम में रखवा दीजिए. आखिर आप इसलिए फेंक रहे हैं मेडल कि उसकी बदनामी होगी. ऐसा तो नहीं है कि आप मेडल को पसंद नहीं करते. उस मेडल को फेंकने के नाम से आपके जार-जार आंसू बह रहे हैं. आप सिर्फ इसलिए फेंकना चाह रहे थे कि उसकी बदनामी हो. मैंने कहा यहाँ बदनामी होगी, कुछ लोग पीटीसी करेंगे, कैमरा भी घुमाएंगे आसपास. थोड़ी देर के बाद भूल जाएंगे. अगर इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी के म्यूजियम लोसान में ये मेडल रखे जाएंगे शीशे के केस में और लिखा जाएगा कि उन्होंने वापस किया तो आने वाले सालों तक जो भी गुजरेगा वहाँ से वो पूछेगा ये मेडल क्यों वापस हुए? और यह बात आपकी हमेशा के लिए कायम हो जाएगी कि इसलिए मेडल रखा गया था.
खैर उन्होंने नहीं सुनी यह बात और वो पहुँच गए लेकिन मुझे अच्छा लगा कि वो खाप के लोग आ गए और उन्होंने कम से कम उनको मेडल फेंकने से मना कर दिया. तो यह बात नहीं थी कि वो मेडल फेंकना चाहते थे, उनके पास उस वक्त कोई चारा नहीं था. बिल्कुल आप फ्रस्ट्रेशन में होंगे तो क्या करेंगे. मरता क्या न करता वाली हालत थी. डू ऑर डाय वाली सिचुएशन थी लेकिन मेडल फेंकना मुझे लगता है कि सही नहीं होता. जो मैंने बताया था कि आईओसी में दे देते तो उससे आने वाले लोग उसे ध्यान रखते और उसकी ज्यादा बदनामी होती है, ब्रजभूषण की भी और शासन की भी, पुलिस की भी और प्रधानमंत्री की भी. जो भी आता है वहाँ पर पूछता कि ये मेडल यहाँ क्यों हैं, उस पर लिखा जाता. तो ये मेडल फेंकना मुझे नहीं लगता कि कोई बहुत अच्छी बात थी. बच गए मेडल फेंकने से. एक निरंतर लड़ाई चलती रहनी चाहिए. मेडल फेंकने से वह बैटल खत्म हो जाती है. मेडल फेंक दिए जाते हैं. उसने तो कुछ करना नहीं था. जो आदमी राजनीतिक तौर पर इतना ताकतवर है, जो आदमी क्रिमिनल है. जो आदमी तीन बार खुद पब्लिक फोरम पर कह चुका है कि मैंने तीन मर्डर किए हैं, जो आदमी टाडा में अरेस्ट हो चुका है., दाऊद इब्राहिम के साथ कनेक्शन होने में. उसने तो खुद बोला कि मेडल 15 रुपए का है. मैंने खुद इंटरनेशनल ओलंपिक कमिटी को एक मेल में भेजा कि जो आदमी आपके मेडल को 15 रुपए का बता रहा है, उसे तुरंत हटा देना चाहिए. जो 15 रुपए का मेडल बता रहा है, उसे उसकी इमोशनल वैल्यू नहीं पता है. उस 15 रुपए के मेडल के पीछे लोग पूरी उम्र गुजार देते हैं अपनी. देखा जाए तो तब भी वह 15 रुपए का नहीं है. वह करीब आठ-नौ हजार रुपए के आसपास है लेकिन उसको लगता है इसकी कोई कीमत ही नहीं है. आप उस मेडल की कीमत नहीं आंक सकते. उसमें असल में उनके परिवार की, उनके दोस्तों की सबकी हिस्सेदारी है. बल्कि मैंने साक्षी के हस्बैंड को बोला कि यह थोड़ा सा मेरा भी है. मैं तुम्हें यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर रियो गया हूँ कवर करने, मैंने तुम्हारी वहाँ पर फुटेज बनाई है, तुम्हें इंटरव्यू कराया है, सब कुछ किया है और वाकई में मुझे लग रहा था कि थोड़ा सा इसमें हमारा भी हिस्सा है. इसलिए नहीं कि मैं क्लेम करने जा रहा हूँ. एक भावना जुड़ी थी उस मेडल से. जो मोहम्मद अली का मेडल था वह एक अलग कहानी थी. कई कहानियाँ बाद में सुनने में आई हैं कि मोहम्मद अली ने मेडल फेंका नहीं था, कहीं रखकर भूल गया था. उसने बोला कह दो कि फेंक दिया और बाद में 1996 ओलंपिक गेम्स में उनको एक और मेडल दिया गया था क्योंकि वो गेम्स कराकर दिखाना चाहते थे कि ब्लैक और व्हाइट के संबंध बहुत अच्छे हैं. वहाँ पर मैं भी था जब उसको मेडल दिया गया था. सो मेडल फेंकना मुझे नहीं लगता कि कुछ ठीक बात होती.
निधीश त्यागी
नॉरिस, यह बताओ कि इस समय कोई रोहतक के आसपास, सिरसा की, सांपला की कोई बच्ची तुमसे आकर पूछे कि मुझे स्पोर्ट्स पसंद है, मुझे स्पोर्ट्सपर्सन बनना है तो क्या बोलोगे उसे.
नॉरिस प्रीतम
देखिए, मैं स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट हूँ, स्पोर्ट्स से बहुत प्यार है. पहले तो मैं कहूँगा कि स्पोर्ट्स जरूर करो, लेकिन साथ-साथ मैं उन्हें अपने बचाव की या ध्यान रखने के लिए कुछ गाइडलाइंस भी दूँगा. अब कुछ तरीके हैं, टेक्नोलॉजी आ गई है, दुनिया भर की चीज़ें हैं. अब मुझे लगता है कि अगर बृज भूषण अरेस्ट हो जाए तो बाकी लोग भी बहुत ज्यादा अलर्ट हो जाएंगे. उन्हें लगेगा कि अब लड़कियां बोलने लगी हैं. यह पहले से भी होता आ रहा है. सेक्शुअल हैरेसमेंट कोई नई बात नहीं है. यह पहली बार है कि लड़कियाँ इतने बड़े ढंग से अपने को सामने लाई हैं. मुझे याद है 1972-73 की बात है. मैं नेशनल स्टेडियम में रनिंग के लिए जाता था और वहाँ एक इंडियन हॉकी टीम ठहरी थी जो किसी टुअर पर बाहर जा रही थी. उस वक्त भारतीय लड़कियों की हॉकी टीम इतनी अच्छी थी नहीं. पहला-दूसरा ट्रिप था. तो हम लड़कियों को रोज़ खेलते देखते थे.
एक रात हम अपनी प्रेक्टिस खत्म करके स्विमिंग पूल पर गए. वहाँ एक लड़की बैठी रो रही थी. हमने देखा कि पूल खाली पड़ा है, पता नहीं रो क्यों रही है. वह इंडिया की प्लेयर थी. हमने उससे पूछा तुम यहाँ क्यों रो रही हो, क्या हो गया? कुछ तकलीफ है तो हम हेल्प कर देते हैं. उससे पहले तो बताने से मना कर दिया. फिर उसने बोला कि जो हॉकी फैडरेशन के प्रेसिडेंट थे उस वक्त, जिनकी अभी डेथ हो गई है, वह कह रहे हैं you come and sleep with me otherwise you will not be in the team. वह इसलिए बैठी रो रही थी और उसने कहा, मुझे यह नहीं करना. हम पांच-छह लड़के थे और हमारे पास भी उतने पैसे नहीं थे. उन दिनों नौकरी तो हम करते नहीं थे. सबने जमा करके उसको रेल का टिकट दिलाया, उसको हमने बॉम्बे के लिए ट्रेन में बैठाया. हमने कहा आप जाओ, दोबारा हॉकी मत खेलना. इस वक्त वह जर्मनी में डॉक्टर है. मैं नाम नहीं बता रहा हूँ. ऐसे ही चलता आ रहा है. मगर इन लड़कियों की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी, लड़कियों से ज्यादा उनके माँ-बाप की, उनके हस्बैंड की. हरियाणा जैसे राज्य के लोग वहाँ बैठे अपनी लड़की के मॉलेस्टेशन की बात कर रहे हैं. इससे बड़ी टेस्टीमनी और क्या होगी. मैं कह रहा हूँ उनको भी एक मेडल देना चाहिए. ये पूरा सोशल स्ट्रक्चर है उसको बदल दिया है उन्होंने. अब हर लड़का सोचेगा कि मैं अपनी पत्नी का साथ दूँ. जहाँ पहले लड़की को मारते-पीटते थे, अब पति लड़की के साथ हड़ताल पर बैठ रहा है और ऐसे मुद्दे पर नहीं कि मुझे तनख्वाह नहीं मिली है या मेरा अलाउंस काट लिया, बल्कि सेक्शुअल हैरेसमेंट जैसी चीज़ के लिए अगर वो हड़ताल पर बैठे हैं, तो वो माँ-बाप और पति, तो उनको जितना कॉंप्लिमेंट दिया जाए, कम रहेगा.
निधीश त्यागी
ये बृजभूषण शरण सिंह का क्या इलाज होगा? ऐसा इसमें क्या खास है कि सारी गैरत एक तरफ हमारी, सारी नैतिकता एक तरफ हमारी, लड़कियों की इज्जत एक तरफ हमारी और फिर यह एक आदमी जो खड़ा हुआ और फिर 140 करोड़ लोगों का देश कुछ नहीं कर पा रहा है?
नॉरिस प्रीतम
देखिए, आपके पहले सवाल का छोटा सा जवाब तो यह है कि मैं और आप दोनों पुरुष हैं और यह पुरुष प्रवृत्ति है. ऐसे आदमी को लगता है कि लड़की जो हैं, वो मेरा मेरा माल है. जैसे कविता जी ने शुरू में ही बोला था कि उसके पास वोट है 115-120 एमएलए हर वक्त उसकी जेब में रहते हैं. अगर उसको आप जेल करते हैं और वो विदड्रॉ कर जाएंगे तो दूसरे दिन योगी सरकार गिर जाएगी. यह अपने आप में एक बड़ा मुद्दा है. दूसरा वह बदमाश है, लोग डरते हैं. मुझे मुझे एक जर्नलिस्ट ने बताया कि एक शाम को वह उससे मिलने गया कुछ क्लैरिफिकेशन के लिए. रेग्युलर रिपोर्टर उस दिन छुट्टी पर था तो मेरा दूसरा दोस्त उसके घर चला गया, तो कहने लगा कि आपको मिला नहीं कभी. उसने कहा कि मेरा दोस्त आया नहीं था, इसलिए मैं आया हूँ. तो वह बोला कि गोंडा आइए न, हमारा जलवा देखिए वहाँ. वह रिपोर्टर पागल हो गया, क्लेरिफिकेशन लेने गया हूँ, वह मुझे अपना जलवा दिखा रहा है. वह बिना क्लेरिफिकेशन के वापस आ गया. तो वह क्रिमिनल है. अगर हाथ में कोई चाकू लेकर सड़क पर जा रहा हो तो मैं और आप भी घबरा जाएंगे. पता नहीं कब मार देगा ये. तो उसको सिर्फ पुलिस और एडमिनिस्ट्रेशन ही पकड़ सकता है. उससे लड़ना बहुत मुश्किल होगा. इसलिए इन्होंने जो कदम उठाया, उसकी दाद देनी पड़ेगी. और ऐसा नहीं है कि इन लड़कियों को ये सब बात मालूम नहीं हैं. हमसे ज्यादा मालूम हैं उनको. यही लड़कियां बेचारी जो आज धरने पर बैठी हैं, पहले उसकी कोठी के बाहर खड़ी रहती थीं. उनको अप्वाइंटमेंट से बुलाया जाता था. बजाय इसके जो खुद बाहर आकर प्लेयर्स से मिले, उनको अंदर बुलाया जाता था. तो वो सब जानते हैं यह बात और उसके बावजूद अगर वहाँ वो बैठी हैं तो यह बहुत बड़ी चीज़ है.
निधीश त्यागी
कविता, यह जो नॉरिस कह रहे थे कि पुरुषों की एक प्रवृत्ति है, हम जो चाहे कर सकते हैं लड़कियों-महिलाओं के साथ. यह एक तरह से बहुत आदिम किस्म की बात भी है कि हमारा पूरा देश खासतौर से उत्तर भारत एक तरह के इस मानस में है, जो इसको बुरा नहीं मान रहा है. एक तरफ तो बदलाव हो रहा है, जहाँ हम देख रहे हैं कि लड़कियाँ अपने हक के लिए लड़ रही हैं, और बहुत सारे लोग उनके साथ भी हैं, पर बहुत सारे जो लोग साथ नहीं भी हैं, तो इसे किस तरह आप देखेंगे कि हमारी क्या प्रॉब्लम है?
कविता श्रीवास्तव
देखिए, आपके इस सवाल को दो भागों में देख सकते हैं. सबसे पहले तो हम लोगों को कहना पड़ेगा कि that the law has to be implemented. अब आप देखिए कि आसाराम को कितनी इम्प्यूनिटी थी राजस्थान में. जोधपुर में ही तो हुआ था. वहाँ की पुलिस गई न, उनको गिरफ्तार करके लाई. कोर्ट के अंदर और बाहर क्या तमाशे नहीं होते थे फिर भी उनको सजा मिली क्योंकि कानून का पालन किया गया. वहाँ पर भी शुरुआती दौर में तो हमें लगा कि यह कभी नहीं होगा. राम रहीम को देख लीजिए. कुलदीप सेंगर. हमें समझना होगा कि यह पिछले कुछ सालों से हो क्या रहा है? यह अचानक जो पावरफुल लोग हैं, इनको अचानक से इतनी ताकत कैसे मिल जाती है कि वो बिल्कुल निर्भीक हो जाते हैं और उनको लगता है उनके हाथ में पूरी कानून व्यवस्था है.
निधीश त्यागी
यह पहले से था या ये अब पकड़े जाने लगे हैं. मतलब दो बातें हैं?
कविता श्रीवास्तव
देखिए, मथुरा रेप केस के समय 1978 से एंटी रेप मूवमेंट चल रहा है.13 पहला अमेंडमेंट मथुरा रेप केस के बाद 1981 में आता है रमीजा बी रेप केस, फिर भंवरी देवी 1992 और फिर विशाखा गाइडलाइंस फिर निर्भया 2012. गिरफ्तारियां हुई हैं, कानून लागू हुआ है फेयर इन्वेस्टिगेशन, न्यायपूर्ण इन्वेस्टिगेशन, सही इन्वेस्टिगेशन हुआ है. और न्याय भी मिला है सजा भी दी गई. लेकिन कुछ लोग कानून से बड़े थे. इसलिए मैं नाम ले रही हूँ जैसे सेंगर.
निधीश त्यागी
बिलकिस केस में बाहर निकल गए उनका क्या?
कविता श्रीवास्तव
वह सिर्फ रेप नहीं था, 16 लोगों को भी मारा गया था. जेनोसाइड के अंतर्गत 16 लोगों को मारा था, जिसमें एक बच्चा जो बहुत ही छोटा था, उसको पत्थर पर पटककर उसके सिर को देकर मारा था. गैंगरेप किया. उसके बाद आप उनको गौरवान्वित करते हैं. यह जो गौरवान्वित करने का पूरा काउंटरकल्चर बन रहा है. एक महिला जो 1978 से लड़ रही थी और मैं निर्भया के टाइम में आने वाली हूँ. निर्भया के समय जरा भारतीय स्टेट को देखें. आखिर वही होम मिनिस्ट्री तो थी दिल्ली वाली. ऐसा कैसे कि 80 लाख केवल अलग-अलग किस्म के इन्वेस्टिगेशंस के लिए रखे गए थे जिसमें फॉरेन्सिक इन्वेस्टिगेशन भी था क्योंकि स्टेट को लग रहा था कि न्याय मिलना चाहिए, फूलप्रूफ केस बनना चाहिए. अब आप देखिए निर्भया के भी 10 साल ही तो हुए हैं. 10 साल बाद पूरा स्टेट एक आरोपी को बचाने में लगा है, तो यह क्या है? मुझे लगता है कि क्राइम तो करेंगे ही लोग लेकिन जब इन्स्टिट्यूशनल क्राइम्स होते हैं, जो कि अभी हो रहा है. यह किसी घर के अंदर नहीं हो रहा है. दूसरे, अगर इन्स्टिट्यूशन्स ही कानून को लागू नहीं करेंगी, when the state establishment itself becomes corrupt it is not about men or anything. वो तो करेंगे जो उनको करना है. उनको राज्य को जवाबदेह बनाना है, कानून को बनाना है लेकिन अगर कानून का राज नहीं होगा तब क्या होगा? यह वाली स्थिति है. इसीलिए ये जो लड़कियों की हताशा उस पल पर आई, जब उन्होंने कहा कि हम मेडल फेंकेंगे. वह इसलिए था कि उन्होंने कहा हम जाएं कहाँ? दिल्ली पुलिस का यह बर्ताव, हमको ऐसे घसीटकर निकाला है और अब हमें जगह भी नहीं दे रहे हैं वापस बैठने के लिए तो हम जाएं कहाँ? क्या हमको न्याय नहीं मिलेगा? और दिल्ली पुलिस का एक कदम अभी तक नहीं आया है यह विश्वास दिलाते हुए कि हम साफ और निष्पक्ष जाँच कर रहे हैं. हम नहीं कह रहे हैं कि आप इन लड़कियों के पक्ष में जाँच करें. हम कह रहे हैं कि do fair and just investigation. अब मुझे कॉन्फिडेन्स चाहिए कि जो मेरी इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी है, वो सही न्यायपूर्ण जांच करे. यह मूल सवाल है कि क्या आज देश में औरत को जांच एजेंसी से न्याय मिलेगा. हम एंटी नेशनल केसों या टेररिज़्म की बात नहीं कर रहे हैं. हम सीधा-सीधा यौनिक हिंसा की बात कर रहे हैं. क्या यौनिक हिंसा में मुझे वापस मथुरा वाले टाइम में जाना होगा? रमीजा बी हैदराबाद वाले टाइम में जाना होगा या भंवरी देवी वाले टाइम में जाना होगा? क्या हम पीछे धकेले जा रहे हैं? हमारे सामने चुनौती, डरावना और भयावह चित्र यह है कि अब मैं कहां जाऊंगी? This is the message.
निधीश त्यागी
जैसे कठुआ में भी था. मैं देख रहा था कि जहाँ-जहाँ भी ऐसा हुआ, एक तरफ तो इन आरोपियों के साथ हमारा बहुत ही सॉफ्ट या एक तरह का बहुत ही मुलायम रवैया रहा है. हमको उनको बिल्कुल निरपराध मान रहे हैं या माफ़ कर देने की मुद्रा में हैं या उनका सम्मान कर रहे हैं, दूसरी तरफ वो लोग हैं जो बहुत ही छोटे हैं और जिनके आरोप साबित नहीं हुए हैं, उनको बिना पूछे बिना प्रक्रिया से गुजरे गिरफ्तार कर लिया जाता है तो इस कनेक्शन को कैसे देखती हैं आप?
कविता श्रीवास्तव
मुझे लगता है कि हमें जो वर्तमान लड़ाई लड़ी जा रही है, उसमें न्याय तो दिलवाना है ही और सफाई करनी है स्पोर्ट्स की, लेकिन साथ-साथ हमें देखना है कि कानून सही रूप में लागू हो. मैं जो बार-बार कह रही हूँ कि कानून वहाँ पर भी गलत है जहाँ केवल शक के दायरे पर आप किसी को भी उठा लेते हैं, शक के दायरे पर पांच साल हो रहे हैं, भीमा कोरेगांव केस को पांचवां साल है. उमर खालिद के 9 जून को 1000 दिन पूरे हो जाएंगे. यहाँ पर केवल शक के आधार पर न आप कोई एविडेंस ला पाए. तो यहाँ पर साफ एक पूर्वाग्रहग्रस्त मशीनरी है जो कहीं न कहीं राजनीति के अंतर्गत किसी न किसी को मोहरा बना रही है और एक मैसेज दे रही है कि अगर आप विपरीत गए अगर आपने विरोध किया, अगर आपने जुबान खोली तो आपके साथ यह होगा. दिलचस्प बात यह है कि यहाँ आप देख रहे हैं कि आप यौनिक हिंसा का मुद्दा नहीं उठा सकते. आप नहीं तय कर सकते कि आपके साथ यौनिक हिंसा भी हुई है. आप सोचिए कि यह किया जा रहा है कि हम तय करेंगे. और अगर आपने चुप्पी तोड़ी भी, मत सोचो कि हम सुनेंगे.
मुझे लगता है कि अगर पूरी राजनीति में पुलिस व्यवस्था को घेर दिया जाएगा तो फिर खत्म हो गई न्याय व्यवस्था इस देश की और माफ़ कीजिएगा, अदालतों की चुप्पी भी हमें ठीक नहीं लग रही है. बहुत पक्ष थे जहाँ अदालत आगे आ सकती थीं. छोटी-बड़ी सारी अदालतें वेकेशन वाली अदालतें भी बोल सकती हैं. ऐसा नहीं है कि अदालतें नहीं बोल सकती थीं. जब एग्जीक्यूटिव यानी कार्यपालिका की कुछ ज्यादती होती है, तो कानून को लागू करने के लिए न्यायपालिका है. मुझे लगता है कि यह चौंकाने वाला समय है और हम सबको गौर करने वाला समय इसलिए भी है कि क्या यह कानून की व्यवस्था आम लोगों के लिए बची रहेगी या उसका राजनीतिकरण होगा? और 1970-80 के दशक से पुलिस के राजनीतिकरण पर दर्जनों रिपोर्ट निकलकर आई हैं लेकिन आज तक उन पर हम लोग कुछ भी कर नहीं पाए हैं, तो यह नुकसान तो जनता का है, यह नुकसान तो लोकतंत्र का है. कोई लोकतंत्र बिना कानून के लागू नहीं रह सकता है, न देश में नियम-कायदे-कानून लागू होंगे. तो मुझे लगता है कि यह समय इस बात के गौर करने का भी है. एक सेकेंड के लिए विनेश, संगीता, बजरंग पुनिया को भूल जाइए. आप सोचिए कि यह क्या कानून व्यवस्था है?
निधीश त्यागी
नॉरिस, अब इन बच्चों के करियर का क्या होने वाला है आपके हिसाब से? सब कुछ दांव पर लग चुका है. क्या ये आगे रेलेवेंट रहेंगे अगले कॉम्पटिशंस के लिए, टूर्नामेंट्स के लिए, स्पर्धाओं के लिए या फिर ये बलि चढ़ जाएंगे?
नॉरिस प्रीतम
ये टूर्नामेंट्स इतने ऊँचे लेवल के होते हैं कि उसकी ट्रेनिंग के लिए एक-एक दिन भारी होता है. दो-ढाई महीने से उन्होंने कुछ नहीं किया और न केवल फिजिकल ट्रेनिंग नहीं है, मेंटल ट्रॉमा ज्यादा है. यह सोचिए एक लड़की ने सेक्शुअल हैरेसमेंट का केस क्या सोचकर लगाया और उसकी क्या हालत हो रही है. रेसलिंग का ध्यान ही नहीं होगा इस वक्त उन बच्चों को. अच्छा अगर अब इसको छोड़ दिया जाए तो मान लीजिए कन्विक्शन नहीं होती और यह बरी हो गए और यह हुआ कि लड़कियां झूठ बोल रही थीं, तो उनका करियर तो वैसे ही खत्म हो गया. वो वापस नहीं जा सकतीं फिर रेसलिंग करने और उस फैडरेशन के तहत तो नहीं जाएंगी और अगर मान लीजिए कि एक हफ्ते-दो हफ्ते में बृजभूषण को जेल हो जाए. उसके पास सेलिब्रेशन चलेगी थोड़े दिन तक. सितंबर में एशियन गेम्स हैं. इसमें समय बहुत कम है. इसलिए मुझे लगता है कि इस साल के लिए इनका करियर तो खत्म ही समझिए. दूसरा क्या मेंटल प्रेशर क्या होगा? मान लीजिए, खूब मेहनत करके फिट हो भी जाएं, सेलेक्ट भी हो जाएं, एशियन गेम्स में जाएं. बाय चांस कितने भी अच्छे से अच्छे रेसलर से हारकर सिल्वर भी आएगा तो यह कोई नहीं कहेगा कि तुमने लड़ा अच्छा था, सिल्वर आया. और बैठो जाकर वहाँ हड़ताल करो. यह हमारा बहुत से लोगों का रिएक्शन होगा. तो इसलिए इनके सामने समस्या है कि क्या करें लेकिन मुझे लगता है कि कम से कम इस साल के एशियन गेम्स तो इनके हाथ से गए और भारत के जो कम से कम तीन चार पक्के मेडल आने थे और इनके साथ औरों पर भी यह प्रभाव पड़ा होगा. मुझे लगता है कि एशियन गेम्स में तीन-चार मेडल तो आराम से हमारे हाथ से चले गए.
निधीश त्यागी
तो मुझे यह बताइए कि अब आप क्या रास्ता देखते हैं? आगे का रास्ता क्या है? यहाँ से हम किस तरफ हमें जाना चाहिए और ऐसा हम क्या करेंगे कि सारा समाज जुड़कर इसे आगे देखे. लड़कियों के जरिए हम सबके लिए आँख खोलने वाली बात भी है. इस तरह आगे का रास्ता या समाधान का रास्ता कैसा दिखाई पड़ता है?
नॉरिस प्रीतम
देखिए, अब यह कानूनी लड़ाई बन गई है. इसमें मेरे कहने से तो कुछ नहीं होगा. मैं अगर झंडा लेकर घूमता रहूँ दिल्ली में तो कुछ नहीं होगा. प्रशासन को करना है, सरकार को करना है, दिल्ली पुलिस को करना है, न्यायालय को करना है, कानून को करना है, जो मुझसे बहुत ऊपर के लोग हैं. वही कुछ करेंगे तो होगा वरना मुझे नहीं लगता कि इस हालत में हम कुछ कर सकते हैं. हमारी भी इस वक्त वही हताशा है, वही फ्रस्ट्रेशन है कि मेडल फेंक दो जाकर गंगा में. हम भी उसी हालत में हैं. मैं भी उसी हालत में घूम रहा हूँ. तो इसलिए मुझे नहीं लगता कि मैं कुछ कर सकता हूँ और मैंने तो बोला था कि मेरे हाथ में होता तो पता नहीं क्या-क्या कर देता.
निधीश त्यागी
हम लोग बात तो कर सकते हैं. कविता क्या ऐसी पांच-सात चीजें करनी चाहिए कि इसमें लड़कियों को इंसाफ मिले.
नॉरिस प्रीतम
मुझे बड़े अफसोस से कहना पड़ता है कि हम वो इंसान हैं जिनकी मेमोरी बड़ी शॉर्ट है. निर्भया केस में राजपथ पर इतना हंगामा हुआ. उसके बाद क्या रेप रुक गए? पांच-पांच साल की बच्ची के साथ अगर रेप और मर्डर हो रहा है, तो हमने उससे कुछ नहीं सीखा है. निर्भया फंड पता नहीं कहाँ गायब हो गया. तो पब्लिक की याददाश्त बहुत छोटी है. हम आज बात कर रहे हैं, खूब कर रहे हैं. थोड़े दिन बाद एक क्रिकेट सीरीज शुरू होगी या कुछ हो जाएगा, सारे चैनल भूल जाएंगे, जो हो रहा है, उसमें लग जाएंगे. यह बड़े अफसोस की बात है. इसको हम एक अच्छा मूवमेंट नहीं बना सके. इसमें पब्लिक पार्टिसिपेशन इतना नहीं रहा जितना होना चाहिए था. किसी आदमी ने पहाड़गंज में, चांदनी चौक में कहीं दिल्ली में रैली नहीं निकाली इसके खिलाफ़. क्यों नहीं निकाली? क्या करना है करने दो, हमें क्या लेना है. बस पूछ लेते हैं सुबह का अखबार देखकर कि अच्छा, रेसलर अभी भी धरने पर बैठे हैं. पता नहीं उनका क्या होगा. फिर आगे बढ़ जाते हैं हम लोग तो यह पब्लिक मेमोरी बहुत शॉर्ट है और ज्यादा कुछ नहीं. मुझे निराशावादी कह सकते हैं आप इस मामले में लेकिन मुझे नहीं लगता कि हम सबक सीखेंगे और बड़े अफसोस की बात होगी मेरे लिए.
कविता श्रीवास्तव
नहीं, मुझे लगता है कि बहुत कुछ हम कर सकते हैं बहुत कुछ हो भी रहा है. मैं आपको बता नहीं सकती कि एक संगठन एनएफआईडब्ल्यू ने सिग्नेचर कैंपेन शुरू किया. कुछ 10-12-15 दिन में पूरे देश से ढाई लाख से ज्यादा सिग्नेचर कोने-कोने से आए हैं. नॉर्थ ईस्ट में मणिपुर जल रहा है. वहाँ की औरतें फिर भी साइन कर रही हैं या दक्षिण से. यह केवल उत्तर भारत में नहीं है. और लोग जब साइन करने आ रहे हैं तो पब्लिक प्लेस में आकर साइन कर रहे हैं. दो बात भी बोल रहे हैं, तो मुझे लगता है कि जो 4 मई को हुआ और उसके बाद जो 28 मई को हुआ. 28 मई को लोग और भी ज्यादा आंदोलित हुए. आम लोग बहुत प्रभावित हुए हैं और जो गुस्सा है उसको चैनलाइज करने का मौका है और हमें वह मंच देना बहुत-बहुत ही जरूरी है और मुझे लगता है कि वही हमें बात सोचनी चाहिए क्योंकि ये मैं राजस्थान में ज्यादा रहती हूँ जहाँ रोज कोई न कोई व्हाट्सऐप पर मैसेज आ रहा है, कोई छोटे-मोटे गाँव में प्रोटेस्ट हो रहा है, नीमका थाना के भराला गांव में. गाँव के नाम भी नहीं सुने और उनके गाँव से हो रहा है या कोई पब्लिक मीटिंग हो रही है तो रेसलर्स के बारे में बात की जा रही है, तो मुझे लगता है कि इस वक्त माहौल है. यह जरूर है कि निर्भया की तरह दिल्ली की सड़कों पर लोग नहीं उतरे. 23 तारीख को इंडिया गेट पर हम लोगों को जाने नहीं दिया गया. आठ-दस हजार लोगों की भीड़ उस दिन भी थी और भी ज्यादा भीड़ हो सकती थी, लेकिन इंडिया गेट ही आपने हर जगह से बंद कर दिया.
देखिए यह समय और वह समय बहुत अंतर है. तब हम लोग सेक्शन-144 तोड़कर कहीं भी जा सकते थे. अब आप तोड़ो सेक्शन-144 तो आपकी पिटाई होती है, आपकी गिरफ्तारी होती है. तो यह मेरा प्रतिरोध करने का अधिकार, मेरा सड़कों पर विरोध करने का अधिकार भी साथ-साथ स्थापित करना है इस लड़ाई में. दिल्ली में बहुत सारे लोग इसलिए नहीं निकल पा रहे हैं. 28 तारीख को ऐसा कोई संगठन नहीं था जो नहीं निकला था जंतरमंतर की तरफ. चारों प्लेयर्स को उठाकर पुलिस चार अलग थानों में ले गई. आप सोचिए टॉर्चर. यह नहीं कि चारों को एक जगह रखते. उसके बाद महिला संगठन और छात्र और अन्य ट्रेड यूनियन वगैरह से लोग बिल्कुल बॉर्डर पर फ़रीदाबाद बॉर्डर पर जो थाना है, गुड़गांव बॉर्डर पर जो थाना है, बहादुरगढ़ बॉर्डर पर जो थाना है. आप सोच सकते हैं कि यह एक माहौल है. मुझे लगता है कि इस वक्त यह एक मौका है सेक्शुअल वॉयलेंस के मुददे पर केवल महिला संगठन नहीं बोल रहे हैं. जंतरमंतर पर खापों और संयुक्त किसान मोर्चा ने भी पंचायत की है. यह एक जन आंदोलन है. इस जन आंदोलन को और भी बल मिलना चाहिए. यौनिक हिंसा के विरुद्ध और साथ-साथ मेरा प्रतिरोध करने के अधिकार. इस तरह की चर्चाएं होनी चाहिए. देश में अभियान स्वरूप एक अभियान जैसे नेशनल कॉल महिला संगठनों ने 19 का दिया था. फिर 28, फिर एक तारीख का कॉल दिया था. इस तरह और कॉल हमको देने पड़ेंगे कि भाई सब निकलो और फलाने दिन यह करो क्योंकि हमारे साथ कोई मीडिया नहीं है. हमारे साथ सोशल मीडिया ही तो है. कौन रिपोर्ट कर रहा है, कौन दिखा रहा है जो हो रहा है. टीवी मीडिया आरोपी बृजभूषण चरण सिंह को स्पेस दे रही है, जहाँ वो खुल्लमखुल्ला कह रहा है कि मैंने तो मर्डर्स किए हैं और मैं तो सच्चा हूँ. यह बिल्कुल पलटी हुई सिचुएशन है. तो हमें इस विपरीत स्थिति में इसको एक मौके के रूप में देखना होगा. इस वक्त जरूर यह लंबा चलने वाला है. जून के महीने में सब छुट्टी पर गए हुए हैं, लेकिन जुलाई में हम शुरू करेंगे सारे कॉलेजों में, आईआईटी में, प्रीमियम इन्स्टिट्यूशंस में, लॉ कॉलेजों में. फिल्ममेकर्स फ़िल्म बनाने लगे हैं. बहुत तरीके हैं.14
यह लड़ाई लंबी चलेगी और इस लंबी लड़ाई के लिए आम लोगों का सड़कों पर मोबिलाइजेशन और अन्य माध्यमों से हम और कैसे करें. अभी तो राइटर्स असोसिएशन ने भी कॉल दिए हैं. अभी तक वो थोड़े सुस्त चुप बैठे हुए थे. पत्रकारों को निकलना चाहिए. आखिर मैं एक महिला पत्रकार भी तो हो सकती हूँ? मैं एक नाट्यकर्मी भी तो हो सकती हूँ? हमने गुंडेचा ब्रदर्स का नहीं सुना क्या? हमने मीटू आर्टिस्ट की दुनिया में नहीं सुना? कोविड के दौरान हम क्या सुन रहे थे? वॉट हैपन्ड इन भोपाल? हम सोच नहीं सकते कि 20 लड़कियों ने अपनी चुप्पी तोड़ी या बिरजू महाराज को लेकर जब लोग आकर कह रहे हैं कि हम बच्चे थे, जब हमारे साथ यह हुआ. वह गंद भी तो निकला और उसे लगातार निकालना है, तो मुझे लगता है कि यह एक अच्छा मौका है कि पब्लिक स्पेस की बनावट कैसी हो, इस पर भी हमारी बात हो. बहुत अच्छा समय है, सिर्फ लॉ मेकिंग नहीं. पब्लिक स्पेस में अगर एक औरत रहेगी पुरुष को अलग ढंग से कंडक्ट करना होगा. मैं आपको यह भी बताना चाहती हूँ मैं 61 साल की हूँ. हमारे समय में क्या अप्रोपिरियेट क्या इनअप्रोपिरियेट था, हम बहुत कुछ सहन कर लेते थे. आजकल की लड़कियों ने नॉर्म्स बदले हैं. वो क्या सोचती हैं, क्या सही है क्या सही नहीं है. वो हमें बता रही हैं कि this too is unwelcome, touching my shoulder is unwelcome. It is not just that you touched my breast. मेरे शोल्डर को भी तुम नहीं छू सकते. तुम मुझे गुड़िया-गुड़िया नहीं बोल सकते. ये पैट्रनाइजिंग नहीं चलेगा.
यंग लड़कियां तय कर रही है पब्लिक स्पेस को. मुझे लगता है इस समय बहस और इस बात के प्रचार का समय है. इसमें एक एक व्यक्ति जो सुन रहा है, हमारे पर्चे बनाने हैं, वीडियो बनाने हैं और जितना हम और कर सकते हैं. इसमें प्रभात फेरियां निकालें. औरतें तो सुबह जाग जाती हैं. सुबह-सुबह निकलें जगह-जगह. यह एक मौका है अगर हमें अभियान चलाने हैं. इस समय एक बहुत बुरा समय दिख रहा है लेकिन हमारा मनोबल टूटता नहीं है, न उन लड़कियों का मनोबल टूटता है. पॉक्सो में क्यों कहते हैं कि तुरंत अरेस्ट करो क्योंकि लड़कियाँ इतनी वल्नरेबल होती हैं कि कई बार अपना स्टेटमेंट बदल देती हैं, माँ-बाप प्रेशर में आ जाते हैं, डर जाते हैं. हमें वह दबाव कायम रखना होगा कि जो सात लड़कियां आई हैं, वो पीछे न हटें, अपने बयान अदालत में देते रहें. वह माहौल भी हमें बनाना है. यह भी मौका हमारे पास इस वक्त है. तो मुझे लगता है कि we have to fight it out to the finish and get justice.
निधीश त्यागी
मेरे ख्याल से यह लगातार चलता रहेगा. सिर्फ इसलिए नहीं कि वो पहलवान लड़कियां हैं और सिर्फ मेडल लेकर आई हैं और देश के लिए लड़ती हैं, देश की नुमाइंदगी करती हैं. इसलिए भी कि उन्होंने इस बात को इस तरह से रेखांकित किया है जो सिर्फ उनका मामला नहीं है. यह उनके व्यक्तिगत मामले भी नहीं हैं. ये शायद एक मानसिक स्तर पर हम सबके मामले हैं. हम सब देख रहे होते हैं, अपने गली-मोहल्लों में कि वह संघर्ष है, उससे एक तरह का नैरेटिव बदलने में और फिर उसको आगे बढ़ाने में मेरे ख्याल से एक बल मिलेगा. तो बहुत धन्यवाद आप दोनों का इसके लिए. कड़वी कॉफी से लगातार जुड़े रहिएगा. यह वीडियो पर, ऑडियो पर और टैक्स्ट में आपके साथ है. आप यहाँ तक पहुँचकर आप हमारी पुरानी श्रृंखलाएं भी देख सकते हैं. बहुत शुक्रिया आपका. हम फिर मिलेंगे जल्दी अगले अंक में. शुक्रिया.
(कड़वी कॉफी का यह पॉडकास्ट सब्सटेक के अलावा गूगल और स्पॉटिफ़ाई पर भी उपलब्ध है. पॉडकास्ट के वीडियो को आप हमारे यूट्यूब पेज पर जाकर देख सकते हैं.)
https://en.wikipedia.org/wiki/Chandgi_Ram
http://wrestlingfederationofindia.org


